रामदास सोरेन : आंदोलनकारी से मंत्री तक का सफर

झारखंड की राजनीति ने स्वतंत्रता दिवस 2025 पर एक बड़ी क्षति झेली, जब राज्य के शिक्षा मंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के वरिष्ठ नेता रामदास सोरेन ने दिल्ली के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। 62 वर्षीय रामदास सोरेन ने चार दशक से भी अधिक समय राजनीति और समाजसेवा को समर्पित किया। ग्राम प्रधान से लेकर कैबिनेट मंत्री तक का उनका सफर संघर्षों, आंदोलनों और जनहित के मुद्दों से भरा रहा।

राजनीतिक जीवन की शुरुआत
रामदास सोरेन का जन्म घाटशिला (पूर्वी सिंहभूम) में हुआ। वर्ष 1980 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की सदस्यता ली और राजनीति में सक्रिय हुए। शुरुआत में वे गुड़ाबांधा पंचायत के अध्यक्ष बने और बाद में पंचायत सचिव की जिम्मेदारी निभाई। उनकी सहजता और सरल स्वभाव के कारण वे ग्रामीण इलाकों में लोकप्रिय हो गए। धीरे-धीरे वे जमशेदपुर प्रखंड कमेटी, अनुमंडल कमेटी और एकीकृत सिंहभूम जिला झामुमो कमेटी के सचिव बने।
90 के दशक में जिला विभाजन के बाद वे पूर्वी सिंहभूम झामुमो के सचिव बने और लगातार 10 साल तक पार्टी के जिलाध्यक्ष पद पर रहे। पार्टी का यह पद ढाई साल के लिए होता था, लेकिन रामदास सोरेन को चार बार जिलाध्यक्ष चुना गया। इससे साफ झलकता है कि संगठन और जनता में उनकी गहरी पकड़ थी।

आंदोलनकारी छवि
रामदास सोरेन ने खुद को केवल एक राजनेता तक सीमित नहीं रखा। वे हमेशा आंदोलनकारी और समाजसेवी की भूमिका में ज्यादा नजर आए। झारखंड आंदोलन के दौरान उन्होंने शिबू सोरेन, चंपाई सोरेन, सुनील महतो, सुधीर महतो और अर्जुन मुंडा जैसे दिग्गज नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। उनके नाम तक बॉडी वारंट जारी हुआ था, लेकिन उन्होंने कभी पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।


विधायक और मंत्री बनने का सफर
रामदास सोरेन पहली बार 2009 में घाटशिला से विधायक बने। इसके बाद 2019 में वे दूसरी बार और 2024 में तीसरी बार विधायक निर्वाचित हुए। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे लगातार अपने क्षेत्र की जनता का विश्वास जीतते रहे।

30 अगस्त 2024 को उन्हें पहली बार कैबिनेट में जगह मिली और जल संसाधन एवं उच्च शिक्षा तकनीकी मंत्री के रूप में शपथ ली। हालांकि उनका यह कार्यकाल ढाई माह ही चला। लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद वे दोबारा कैबिनेट मंत्री बने और इस बार उन्हें स्कूली शिक्षा मंत्री का दायित्व सौंपा गया।


शिक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने कहा था कि “नयी सरकार जनहित में बेहतर काम करेगी, जमीन पर बदलाव दिखेगा और आगे और बड़े निर्णय लिये जाएंगे।” उनकी यह सोच झारखंड में शिक्षा सुधार की दिशा में उम्मीद जगाने वाली थी।

जनता से जुड़ाव और सामाजिक सरोकार
रामदास सोरेन का व्यक्तित्व सहजता और सरलता से भरा था। आम से खास तक वे सभी के चहेते बने। वे हमेशा अपने विधानसभा क्षेत्र में लोगों के बीच मौजूद रहते और उनकी समस्याओं को सुनते। समाजसेवा उनके जीवन का अहम हिस्सा थी। यही कारण है कि वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि समाजसेवी और जननायक के रूप में जाने जाते रहे।
निधन से उपजा शोक
15 अगस्त 2025 को स्वतंत्रता दिवस के दिन उनके निधन की खबर ने पूरे झारखंड को स्तब्ध कर दिया। घाटशिला विधानसभा क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। झामुमो परिवार, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कोल्हान टाइगर चंपाई सोरेन ने उन्हें अपना बेहद करीबी साथी बताया। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने भी कहा कि “रामदास सोरेन केवल पार्टी का स्तंभ नहीं थे, बल्कि अलग राज्य आंदोलन की आत्मा थे।”

परिवार और निजी जीवन
रामदास सोरेन अपने पीछे पत्नी सूरजमनी सोरेन (56 वर्ष), तीन बेटे – सोमेन, रबिन और रूपेश सोरेन, और बेटी रेणुका सोरेन को छोड़ गए हैं।
रामदास सोरेन की जीवनी एक ऐसे नेता की कहानी है, जिसने ग्राम प्रधान से कैबिनेट मंत्री तक का सफर तय किया, लेकिन अपनी पहचान हमेशा आंदोलनकारी और समाजसेवी के रूप में बनाए रखी। उनका निधन न केवल झारखंड मुक्ति मोर्चा के लिए, बल्कि पूरे राज्य के लिए अपूरणीय क्षति है।