झारखंड खजाने से 2,812 करोड़ रुपये के गबन का खुलासा, सरकार की पारदर्शिता पर उठे सवाल

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रांची से अमित : झारखंड में खजाने से 2,812 करोड़ रुपये की निकासी का मामला सामने आया है, जिसने राज्य प्रशासन और सरकार की वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। महालेखाकार (CAG) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यह राशि विभिन्न विभागों द्वारा एडवांस के रूप में निकाली गई थी, लेकिन इसका समायोजन अब तक नहीं किया गया। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार को घेरते हुए इसे भ्रष्टाचार और सरकारी तंत्र की विफलता का उदाहरण बताया है।

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CAG की रिपोर्ट ने खोली पोल

महालेखाकार की रिपोर्ट में बताया गया कि झारखंड सरकार के विभिन्न विभागों ने वर्षों पहले एसी-डीसी (एब्स्ट्रैक्ट-कंटिंगेंसी और डिटेल्ड-कंटिंगेंसी) बिल के तहत एडवांस राशि निकाली थी। इन बिलों के तहत निकाली गई राशि का उपयोग और समायोजन एक महीने के भीतर होना चाहिए था, लेकिन अब तक 4,937 करोड़ रुपये के डीसी बिल लंबित हैं। इसमें से केवल 1,698 करोड़ रुपये का समायोजन किया गया है, जबकि 2,812 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं मिल पाया है।

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ग्रामीण विकास विभाग पर बड़ा सवाल

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रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि ग्रामीण विकास विभाग से अन्य विभागों ने 411 करोड़ रुपये निकाले, लेकिन इसका उपयोग कहां और कैसे हुआ, इसका कोई विवरण नहीं है। यह गड़बड़ी सिर्फ हाल के वर्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें 23 साल पुराने डीसी बिल भी शामिल हैं।

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बीजेपी का सरकार पर हमला

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15 aug 10

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस मामले को लेकर अपने सोशल मीडिया अकाउंट ‘X’ पर लिखा,
“झारखंड सरकार के खजाने से 2,812 करोड़ रुपये के गबन का मामला सामने आया है। यह राशि विकास कार्यों के लिए थी, लेकिन इसे सरकार और अधिकारियों ने अपनी तिजोरी भरने में इस्तेमाल किया। जनता के पैसे का इस तरह दुरुपयोग निंदनीय है। सरकार को इसका जवाब देना होगा।”
मरांडी ने आगे कहा कि महालेखाकार की रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि सरकार का वित्तीय प्रबंधन पूरी तरह विफल है।

सरकार की कार्रवाई पर सवाल

मार्च 2023 में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई थी, जिसने सभी विभागों को लंबित डीसी बिलों का निपटारा करने और खर्च न की गई राशि को खजाने में वापस जमा करने के निर्देश दिए थे। इसके अलावा तत्कालीन मुख्य सचिव एल. खियांग्ते और वित्त सचिव प्रश्वंत कुमार ने भी विभागीय अधिकारियों के साथ बैठक कर इसी मुद्दे पर चर्चा की थी। लेकिन इन निर्देशों के बावजूद अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

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फंड का समायोजन अब भी अधूरा

CAG की रिपोर्ट के मुताबिक, 426 करोड़ रुपये का डीसी बिल प्रक्रिया में है, जबकि 2,812 करोड़ रुपये का कोई हिसाब नहीं है। यह निकासी वित्तीय नियमों और प्रक्रियाओं का खुला उल्लंघन है। रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि राज्य सरकार के कई विभाग एडवांस राशि का उपयोग किए बिना ही इसे लंबित छोड़ रहे हैं।

राजनीतिक खींचतान तेज

इस मामले ने झारखंड में राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। विपक्षी दल, खासकर बीजेपी, इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर है। बाबूलाल मरांडी ने कहा कि यह जनता के धन के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने सरकार पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगाया और इसे विकास कार्यों में बाधा बताया।

2,812 करोड़ रुपये की यह वित्तीय अनियमितता झारखंड सरकार के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े करती है। महालेखाकार की रिपोर्ट और विपक्षी दलों के आरोपों ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जनता के धन का सही उपयोग सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर समय पर इस मामले का समाधान नहीं हुआ, तो यह झारखंड के विकास में बड़ी रुकावट बन सकता है।

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