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हजारीबाग की सियासत गरमाई: खनन कंपनी पर अंबा का हमला, कंपनी ने बताई सच्चाई

हजारीबाग/बड़कागांव: हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड में रैयतों की जमीन पर हो रहे कोयला खनन को लेकर कांग्रेस की पूर्व विधायक अंबा प्रसाद और दक्षिण भारत की माइनिंग कंपनी रित्विक प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के बीच टकराव ने जोर पकड़ लिया है। विवाद अब जमीन बचाओ आंदोलन और निजी हित के आरोप-प्रत्यारोप के बीच फंस गया है।

अंबा प्रसाद का दावा: धमकी, शोषण और रैयतों की आवाज
पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने रविवार को एक वीडियो और फोन कॉल रिकॉर्डिंग सार्वजनिक करते हुए आरोप लगाया कि रित्विक कंपनी के मालिक सीएम राकेश और उनके भाई सीएम राजेश (जो भाजपा सांसद भी हैं) ने उन्हें और उनके पिता, पूर्व मंत्री योगेंद्र साव को खुले तौर पर धमकी दी।
अंबा ने कहा—
“कंपनी के मालिक ने फोन पर कहा कि मेरे पिता को हर हाल में जेल भेजा जाएगा और मेरा राजनीतिक जीवन बर्बाद कर दिया जाएगा। यह धमकी इस आत्मविश्वास के साथ दी गई मानो पूरा सिस्टम उनके पैसों और प्रभाव में है।”
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि कंपनी जमीन अधिग्रहण में रैयतों का शोषण कर रही है और उनकी सहमति के बिना जबरन खनन कार्य कर रही है। मुआवजा, रोजगार और विस्थापन जैसे मुद्दों पर ग्रामीणों की मांगें पूरी नहीं की जा रही हैं। इसी वजह से वह लगातार धरना-प्रदर्शन कर रही हैं।
अंबा का आरोप है कि धमकी के बाद पुलिस प्रशासन कंपनी के दबाव में आ गया और उनके समर्थकों पर कार्रवाई शुरू हो गई। “लगभग 400 पुलिस बल घर पर धावा बोलकर मेरे गार्ड, ड्राइवर और ग्रामीणों को पीट-पीट कर गिरफ्तार कर रही है।”


कंपनी का पलटवार: जनता नहीं, निजी स्वार्थ के लिए आंदोलन
अंबा प्रसाद के आरोपों पर रित्विक कंपनी ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पलटवार किया। कंपनी के अधिकारियों ने कहा कि अंबा प्रसाद जनता के नाम पर निजी फायदा लेना चाहती हैं और आंदोलन जनता के हित में नहीं है।

कंपनी ने दावा किया कि अंबा प्रसाद, उनके पिता योगेंद्र साव और भाई खुद हैदराबाद जाकर 13 और 14 अगस्त को कंपनी मालिक से मिले थे। इससे पहले 7 अगस्त को दिल्ली में भी बैठक हुई। सवाल उठाते हुए कंपनी ने कहा कि “अगर हम गुंडा और शोषक हैं तो फिर अंबा प्रसाद और उनका परिवार इतनी बार बैठक करने क्यों आया?”
कंपनी का कहना है कि खनन का काम पिछले चार साल से चल रहा है और स्थानीय जनता विरोध नहीं कर रही। अगर गड़बड़ी होती तो जनता खुद रोक देती। उनका आरोप है कि अंबा प्रसाद आधी-अधूरी ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी कर जनता को गुमराह कर रही हैं।


बैकग्राउंड: अंबा प्रसाद और जमीन आंदोलन की राजनीति
अंबा प्रसाद का परिवार लंबे समय से बड़कागांव और आसपास के इलाकों में जमीन अधिग्रहण व विस्थापन के मुद्दे पर सक्रिय रहा है। उनके पिता योगेंद्र साव और मां नीलम देवी भी कई बार माइनिंग परियोजनाओं के खिलाफ आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके हैं। बड़कागांव में एनटीपीसी और अन्य कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण हमेशा से विवादित रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि पर्याप्त मुआवजा और रोजगार की गारंटी नहीं दी जाती। दूसरी ओर कंपनियां और सरकार इसे विकास के लिए जरूरी कदम बताती हैं।
राजनीतिक रंग और टकराव
यह विवाद अब केवल जमीन और मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक रंग भी ले चुका है। कांग्रेस नेता अंबा प्रसाद बीजेपी सांसद से जुड़ी कंपनी पर सीधे हमलावर हैं। वहीं कंपनी के प्रेस नोट में अंबा पर यह आरोप लगाया गया कि वह आंदोलन को राजनीति चमकाने और निजी हित साधने का माध्यम बना रही हैं। गौरतलब है कि अंबा प्रसाद का राजनीतिक करियर शुरू से ही विवादों और संघर्ष से जुड़ा रहा है। योगेंद्र साव की विरासत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने बड़कागांव में जमीन और विस्थापन के मुद्दों पर अपनी पहचान बनाई।
सवाल अब भी वही: जनता बनाम निजी स्वार्थ?
यह पूरा विवाद कई अहम सवाल खड़ा करता है—
क्या यह आंदोलन वास्तव में विस्थापित रैयतों की आवाज है या राजनीतिक फायदे का साधन?
क्या कंपनी वास्तव में जनता को पर्याप्त मुआवजा और रोजगार दे रही है या केवल खनन लाभ देख रही है?
प्रशासन की भूमिका निष्पक्ष है या कंपनी के दबाव में काम कर रही है?
सच यही है कि इस विवाद का असर सीधे हजारों ग्रामीणों पर पड़ रहा है। जमीन, रोजगार और विस्थापन के मुद्दे झारखंड की राजनीति में हमेशा केंद्र में रहे हैं। ऐसे में बड़कागांव का यह संघर्ष राज्य की राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।