शिबू सोरेन और रामदास सोरेन के निधन के बाद झामुमो के सामने नई सियासी परीक्षा
रामदास सोरेन के बेटे सोमेश को कैबिनेट में जगह
रांची: झारखंड की राजनीति इस समय संक्रमण और बदलाव के दौर से गुजर रही है। राज्य ने एक महीने के भीतर दो बड़े नेताओं को खो दिया है—झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) के संस्थापक व दिशोम गुरु शिबू सोरेन और राज्य के शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन। इन दोनों नेताओं के निधन ने न सिर्फ पार्टी संगठन, बल्कि सरकार और झारखंड की सियासत पर गहरा असर डाला है। अब सबसे बड़ा सवाल है कि इन दोनों नेताओं की जगह कौन लेगा? राज्यसभा की एक सीट शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हो गई है, वहीं रामदास सोरेन की जगह राज्य कैबिनेट और घाटशिला विधानसभा दोनों में तय की जानी है।
सोमेश सोरेन का नाम लगभग तय
रामदास सोरेन के निधन के बाद घाटशिला विधानसभा की सीट खाली हो गई है। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार छह महीने के भीतर उपचुनाव कराना अनिवार्य होगा। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यह सीट झामुमो के लिए बेहद अहम है और पार्टी इसे अपने ही परिवार में रखने के मूड में है।
झामुमो सूत्रों के अनुसार, रामदास सोरेन के बड़े पुत्र सोमेश चंद्र सोरेन का नाम लगभग तय माना जा रहा है। सोमेश अपने पिता के साथ लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रहे हैं और क्षेत्रीय स्तर पर संगठन और जनता के बीच उनकी पहचान भी बनी है। वे घाटशिला विधानसभा क्षेत्र में अपने पिता का कामकाज देखते रहे हैं और रामदास सोरेन के असमय निधन के बाद पार्टी और परिवार दोनों उन्हें ही राजनीतिक विरासत सौंपने की तैयारी में हैं।
यह भी माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लगातार परिवार से संपर्क में हैं और जल्द ही कैबिनेट में रिक्त स्थान को भी भरने पर फैसला लेंगे। संभावना है कि कैबिनेट में भी सोमेश सोरेन को जगह देकर पार्टी “परिवार और परंपरा” को आगे बढ़ाए।
घाटशिला उपचुनाव पर नजर
झामुमो की यह सीट इंडिया गठबंधन के लिए भी अहम होगी। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद झारखंड में एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों ही अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं। घाटशिला का उपचुनाव झामुमो के लिए “परिवार की सीट” माना जा रहा है। इसलिए पार्टी यहां कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। स्थानीय कार्यकर्ताओं का मानना है कि जनता रामदास सोरेन के काम को याद करती है और उनकी जगह बेटे सोमेश को चुनने की संभावना ज्यादा होगी। अगर ऐसा होता है तो झामुमो घाटशिला में सहानुभूति लहर और पारिवारिक जुड़ाव का फायदा उठाएगी।
राज्यसभा सीट पर कड़ा मुकाबला
दूसरी ओर, शिबू सोरेन का निधन झामुमो और पूरे झारखंड के लिए एक युग का अंत माना जा रहा है। 21 जून 2026 तक उनका कार्यकाल बाकी था, लेकिन अब राज्यसभा की सीट खाली हो गई है। इस सीट पर पार्टी किसका नाम तय करती है, यह सबसे बड़ा सवाल है।
राज्यसभा की इस सीट को लेकर झामुमो के भीतर कई दावेदार हैं। शिबू सोरेन की तरह कद्दावर और जनाधार वाले नेता को रिप्लेस करना आसान नहीं है। पार्टी के पास दो विकल्प हैं—या तो किसी वरिष्ठ और अनुभवी नेता को भेजा जाए ताकि दिल्ली की राजनीति में पार्टी का कद बरकरार रहे, या फिर किसी युवा चेहरे को आगे लाकर एक नया राजनीतिक संदेश दिया जाए।
कयास यह भी हैं कि झामुमो इस सीट पर ऐसा नाम चुन सकती है, जो पार्टी कैडर के बीच लोकप्रिय हो और शिबू सोरेन के करीबियों में गिना जाता हो।
राजनीतिक समीकरण और संदेश
शिबू सोरेन और रामदास सोरेन की अनुपस्थिति में झामुमो को दोहरी चुनौती मिली है। एक ओर उसे अपने संगठन और सरकार में खाली हुई जगह भरनी है, तो दूसरी ओर राजनीतिक संतुलन और गठबंधन की मजबूती का भी ध्यान रखना है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि घाटशिला में सोमेश सोरेन को आगे कर पार्टी सहानुभूति और परंपरा दोनों का लाभ लेना चाहती है। वहीं, राज्यसभा सीट पर फैसला झामुमो की रणनीतिक सोच को दिखाएगा—क्या पार्टी “अनुभव” को तरजीह देगी या “युवा नेतृत्व” को आगे बढ़ाएगी।
आने वाले दिनों में इन दोनों फैसलों से न सिर्फ झामुमो की दिशा तय होगी, बल्कि झारखंड की राजनीति पर भी गहरा असर पड़ेगा।








