चांडिल डैम का बढ़ा जलस्तर, विस्थापित गांवों में बाढ़ जैसे हालात, संगठनों का फूटा गुस्सा
सरायकेला : चांडिल डैम का जलस्तर बुधवार की रात अचानक बढ़ जाने से दर्जनों विस्थापित गांवों के खेत पूरी तरह पानी में डूब गए। पकी हुई धान की फसलें नष्ट होने की कगार पर पहुंच गई हैं, जिससे किसानों में भारी आक्रोश है।
बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन और जेएलकेएम के केंद्रीय प्रवक्ता बिष्णु विद्रोही ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सरकार और विभाग पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया है।

धान की खड़ी फसल डूबी, किसानों की मेहनत पर पानी
चांडिल डैम से लगे रसुनिया, बाबुचामदा, तिलाईटांड़, दयापुर, झापागोड़ा, कुमारी, केंदाआंदा सहित अन्य विस्थापित गांवों में अचानक पानी भरने से खेत तालाब में बदल गए हैं।
पानी की तेज़ बढ़ोतरी ने किसानों की पकी हुई फसल को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है। ग्रामीणों के अनुसार धान कटाई के ठीक पहले फसल पानी में समा जाने से आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि बिना किसी पूर्व सूचना के जलस्तर बढ़ा दिया गया, जबकि यह क्षेत्र पूरी तरह विस्थापित आबादी का है और यहां रहने वाले लोग पहले से ही कई समस्याओं से जूझ रहे हैं।

विस्थापित बोले—“घर दिया, जमीन दी, बदले में मिला दर्द”
विस्थापित अधिकार मंच और जेएलकेएम नेताओं ने कहा कि चांडिल डैम परियोजना के नाम पर लोगों ने अपने घर, जमीन और जीविका सब कुछ सरकार को सौंप दिया, लेकिन बदले में उन्हें आज तक न तो घर, न नौकरी, न समुचित मुआवजा, और न पुनर्वास मिला।
नेताओं ने कहा कि “विस्थापितों ने क्या गुनाह किया था कि बार-बार उनकी फसलें डुबोई जा रही हैं? सरकार की लापरवाही ने लोगों को दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया है।”

गेट खोलने की मांग, आंदोलन की चेतावनी
राकेश रंजन और बिष्णु विद्रोही ने कहा कि उन्होंने विभागीय अधिकारियों और सरकार को तुरंत कार्रवाई करने को कहा है। संगठनों की प्रमुख मांगें हैं की चांडिल डैम के गेट तुरंत खोले जाएं ताकि जलस्तर नियंत्रित किया जाए और किसानों की क्षति का आकलन कर मुआवजा दिया जाए।
दोनों संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन ने तत्काल कदम नहीं उठाया, तो विस्थापित समुदाय उग्र आंदोलन करने को मजबूर होगा।








