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“चुनाव तक चुप्पी, चुनाव बाद त्याग का उपदेश” — विनोद पांडेय का मोदी सरकार पर बड़ा हमला

Vinod Pandey attack on modi

रांची: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, सोना नहीं खरीदने, विदेश यात्राओं से बचने और वर्क फ्रॉम होम अपनाने की अपील के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। झारखंड की राजनीति में भी इस मुद्दे को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। विनोद पांडेय ने प्रधानमंत्री की अपील को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “चुनाव तक सरकार चुप रही और अब जनता को त्याग का ज्ञान दिया जा रहा है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने पांच राज्यों के चुनाव खत्म होने तक देश की वास्तविक आर्थिक स्थिति को जनता से छिपाकर रखा।

“अगर संकट था तो पहले क्यों नहीं बताया?”
विनोद पांडेय ने कहा कि प्रधानमंत्री आज वैश्विक आर्थिक संकट, युद्ध और सप्लाई चेन बाधाओं का हवाला देकर जनता से खर्च कम करने की अपील कर रहे हैं, लेकिन यह परिस्थितियां अचानक पैदा नहीं हुईं। उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया तनाव, वैश्विक महंगाई और डॉलर संकट लंबे समय से चल रहे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि हालात इतने गंभीर थे तो चुनावों के दौरान जनता को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई। उनके अनुसार सरकार उस समय राजनीतिक नुकसान से बचना चाहती थी, इसलिए वास्तविक स्थिति छिपाई गई।

“चुनाव खत्म होते ही जनता को त्याग का संदेश”
उन्होंने कहा कि चुनाव समाप्त होते ही अब लोगों से कहा जा रहा है कि पेट्रोल कम खर्च करें, सोना खरीदना बंद करें, विदेश यात्राएं टाल दें, डेस्टिनेशन वेडिंग से बचें और घर से काम करें। विनोद पांडेय ने कहा कि यह दिखाता है कि सरकार अब खुद स्वीकार कर रही है कि देश की आर्थिक स्थिति दबाव में है।

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“विश्वगुरु के दावे और जमीन की हकीकत अलग”
उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से केंद्र सरकार “विश्वगुरु”, “आत्मनिर्भर भारत”, “5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी” और “न्यू इंडिया” जैसे बड़े-बड़े नारे देती रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर आम आदमी की स्थिति लगातार खराब हुई है। उन्होंने कहा कि आज देश में बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई लगातार रिकॉर्ड स्तर पर है, मध्यम वर्ग की बचत खत्म हो रही है और युवाओं के सामने रोजगार का संकट गहराता जा रहा है।

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“जनता टैक्स भी दे और त्याग भी करे?”
विनोद पांडेय ने केंद्र सरकार की टैक्स नीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पेट्रोल और डीजल पर भारी टैक्स लगाकर जनता से पहले ही करोड़ों रुपये वसूले जा चुके हैं। अब उसी जनता से कहा जा रहा है कि ईंधन कम इस्तेमाल करो।
उन्होंने पूछा कि जब सरकार टैक्स के जरिए आम लोगों की जेब पर बोझ डाल चुकी है, तो अब त्याग की जिम्मेदारी केवल जनता पर क्यों डाली जा रही है।

विदेश नीति को भी बताया विफल
उन्होंने प्रधानमंत्री की विदेश नीति पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। विनोद पांडेय ने कहा कि जिन देशों को कभी भारत का सबसे करीबी मित्र बताया जाता था, वही अब भारत से दूरी बनाते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अमेरिका के दबाव में झुकती नजर आ रही है और इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि विदेश नीति का उद्देश्य देश को मजबूत बनाना होता है, लेकिन आज भारत को आयात, डॉलर और तेल कीमतों के संकट से जूझना पड़ रहा है।

“प्रधानमंत्री खुद विदेश यात्रा करते हैं”
विनोद पांडेय ने कहा कि जनता को विदेश यात्राएं टालने की सलाह दी जा रही है, लेकिन प्रधानमंत्री खुद लगातार विदेशी दौरों पर जाते हैं। उन्होंने सवाल किया कि यदि ऑनलाइन मीटिंग और वर्क फ्रॉम होम इतने प्रभावी हैं, तो क्या सरकार और मंत्रीमंडल भी उसी मॉडल को अपनाएंगे?

कोविड काल की याद दिलाई
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में जनता से लगातार प्रतीकात्मक अपीलें की गईं। कभी थाली बजाने, कभी मोमबत्ती जलाने और कभी घरेलू खर्च कम करने की सलाह दी गई।अब फिर लोगों से कहा जा रहा है कि कम खरीदो, कम घूमो और कम खर्च करो। उन्होंने कहा कि “अगर 12 वर्षों की सरकार के बाद भी जनता को सिर्फ त्याग ही करना है, तो विकास आखिर हुआ कहां?”

मध्यम वर्ग और गरीबों पर सबसे ज्यादा असर
विनोद पांडेय ने कहा कि सरकार की आर्थिक नीतियों का सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि रसोई गैस महंगी हुई, खाद्य सामग्री के दाम बढ़े, शिक्षा और स्वास्थ्य महंगे हुए और रोजगार के अवसर घटे। ऐसे में लोगों की क्रय शक्ति लगातार कमजोर होती जा रही है।

“देश को भाषण नहीं, समाधान चाहिए”
उन्होंने कहा कि देश की जनता अब केवल भाषण और नारों से संतुष्ट नहीं होगी। जनता को चाहिए रोजगार, महंगाई से राहत, स्थिर अर्थव्यवस्था और मजबूत सामाजिक सुरक्षा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी जनता का बोझ कम करना है, न कि लगातार त्याग की अपील करना।

राजनीतिक माहौल और गरमाने के संकेत
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई, बेरोजगारी, ईंधन कीमत और आर्थिक दबाव जैसे मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहेंगे। विपक्ष इन मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार हमलावर रुख अपनाए हुए है। प्रधानमंत्री की हालिया अपीलों के बाद विपक्ष ने सरकार की आर्थिक और विदेश नीति पर सवाल तेज कर दिए हैं।विनोद पांडेय का बयान भी इसी राजनीतिक बहस का हिस्सा है, जिसमें जनता पर बढ़ते आर्थिक बोझ, महंगाई और सरकार की नीतियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

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