पाकुड़ में सरकारी हाट की जमीन निजी नाम पर! RTI में बड़ा खुलासा, जांच की मांग तेज

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महेशपुर अंचल कार्यालय की भूमिका पर उठे सवाल — नकली बंदोबस्ती और राजस्व रजिस्टर में गड़बड़ी की आशंका

रांची से कुमार अमित
झारखंड के पाकुड़ जिले के महेशपुर अंचल से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ की देवीनगर मौजा, दाग संख्या 409, रकबा 3 बीघा 1 कट्ठा 16 धूर की भूमि — जो सर्वे खतियान में अनाबादी (सरकारी) जमीन के रूप में दर्ज है —
वह अब रजिस्टर-2 में निजी व्यक्तियों के नाम पर दर्ज दिख रही है।

यह खुलासा खुद महेशपुर अंचल अधिकारी एवं जनसूचना पदाधिकारी के ज्ञापांक संख्या 317/राo/20/11/21 में हुआ है, जो सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जारी किया गया।

सरकारी दस्तावेज़ों में दोहरी जानकारी!
उक्त RTI जवाब में अंचल अधिकारी ने स्वीकार किया कि यह जमीन अनाबादी खतान्तर्गत है — यानी सरकारी संपत्ति है। लेकिन उसी पत्र में आगे लिखा गया कि

“राजस्व पंजी-2 में हेमंत कुमार सिंह, उज्जवल कुमार सिंह और विजय कुमार सिंह (पिता अश्विनी कुमार सिंह, सकिम देवीनगर) के नाम से प्रति व्यक्ति 1 बीघा जमीन की जमाबंदी कायम है।”

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यानी एक ही जमीन पर दो तरह का रिकॉर्ड — एक सरकारी, दूसरा निजी! प्रश्न उठता है कि जब यह जमीन अनाबादी है, तो निजी जमाबंदी संभव ही कैसे हुई?

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हाट लगती है, शेड बना है — फिर कैसे हुई निजी जमाबंदी?
RTI में आगे यह भी स्पष्ट किया गया है कि देवीनगर की उक्त भूमि पर “हाट लगता है, शेड निर्मित है, और पूर्व में बंदोबस्ती होती थी जो फिलवक्त स्थगित है।” इससे यह साफ है कि यह जमीन लंबे समय से सरकारी उपयोग में रही है।

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फिर सवाल उठता है — जब हाट का शेड बन रहा था, या जब बंदोबस्ती होती थी, तब क्या जमीन के “कथित मालिकों” ने कभी आपत्ति दर्ज कराई? यदि यह निजी जमीन थी, तो हाट निर्माण के वक्त उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया?

सूत्र बताते हैं कि अब उसी जमीन को कट्ठा स्तर पर बेचा जा रहा है — जो अपने आप में बड़ा सवाल खड़ा करता है कि अंचल प्रशासन ऐसी गतिविधियों पर चुप क्यों है?

राजा की बंदोबस्ती या नकली दस्तावेज़ों का खेल?
जिन नामधारियों के नाम रजिस्टर-2 में दर्ज हैं, उनका दावा है कि उनके पूर्वज स्वर्गीय इंद्रजीत सिंह को उक्त जमीन तत्कालीन राजा ने बंदोबस्त की थी — यानी यह मामला जमींदारी उन्मूलन से पहले का है।

लेकिन जांच में सामने आया कि इंद्रजीत सिंह के पुत्र स्वर्गीय ज्योतिष चंद्र सिंह की मृत्यु लगभग 70 वर्ष पहले हुई थी, और उनके सभी पाँच पुत्रों में से केवल अश्विनी कुमार सिंह के तीन पुत्रों के नाम पर ही जमाबंदी कर दी गई है। अर्थात् —

“संपत्ति साझा थी, लेकिन रजिस्टर-2 में केवल एक शाखा के नाम कैसे दर्ज हो गई?”

यही वह बिंदु है जो इस पूरे प्रकरण को संदिग्ध बनाता है।

2018 से 2021 के बीच हुआ ‘खेल’?
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि 2018 से 2021 के बीच इस गड़बड़ी को अंजाम दिया गया। बताया जाता है कि महेशपुर अंचल कार्यालय के ही कुछ कर्मियों ने नकली बंदोबस्ती पर्ची तैयार कराई — जिसमें “राजा” के पुराने हस्ताक्षर की हुबहू नकल की गई थी।

अगर यह सच है, तो यह सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी और सरकारी सिस्टम की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है।

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“जांच जरूरी है, नहीं तो कई हत्याएँ और षड्यंत्र जन्म लेंगे”
स्थानीय जानकारों का कहना है कि “एक इंच जमीन भी यहां हत्या और षड्यंत्र की जड़ बन जाती है। ऐसे में सरकारी हाट की जमीन पर निजी नाम दर्ज होना न सिर्फ अवैध है, बल्कि सामाजिक असंतुलन पैदा करने वाला कदम है।”

रिपोर्ट के अनुसार, पाकुड़ जिले में ऐसे कई मामलों में जमींदारी के नकली हस्ताक्षरों का उपयोग कर अरबों की सरकारी जमीन हड़प ली गई है। देवीनगर हाट का मामला उनमें से सबसे ताजा और संगीन है।

प्रशासन पर जनता की निगाह
जनता अब पूछ रही है —

“क्या हाट की सरकारी जमीन निजी नाम पर करने वाले सुरक्षित रहेंगे?” “क्या अंचल कार्यालय की मिलीभगत के बिना यह संभव था?”

यह मामला सिर्फ एक गांव की जमीन का नहीं, बल्कि झारखंड की शासन व्यवस्था और राजस्व प्रणाली की पारदर्शिता की परीक्षा है।

देवीनगर हाट का यह प्रकरण उस सच्चाई को उजागर करता है, जो वर्षों से फाइलों और हस्ताक्षरों की आड़ में दबी थी। अगर प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं करता, तो यह “अनाबादी भूमि को निजी संपत्ति” बनाने की एक खतरनाक परंपरा बन जाएगी — जो आने वाले वर्षों में पूरे झारखंड के लिए गंभीर चुनौती साबित होगी।

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