‘गिनती में आओ’: रांची में जनगणना और डाक विभाग के ऐतिहासिक रिश्ते को दिखाती अनूठी प्रदर्शनी
ऑड्रे हाउस में दो दिवसीय आयोजन, 1951 से 2011 तक जनगणना में भारतीय डाक की भूमिका को किया गया प्रदर्शित
रांची: डिजिटल युग से पहले भारत में जनगणना जैसे विशाल कार्य को सफल बनाने में भारतीय डाक विभाग की क्या भूमिका थी, इसे समझने का एक अनूठा अवसर राजधानी रांची में देखने को मिल रहा है। रांची के ऑड्रे हाउस में 5 और 6 जून को अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित प्रदर्शनी “गिनती में आओ: भारत में जनगणना का डाक इतिहास” लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। प्रदर्शनी का उद्देश्य जनगणना प्रक्रिया में भारतीय डाक विभाग के उस ऐतिहासिक योगदान को सामने लाना है, जिसने डिजिटल तकनीकों के आगमन से पहले देश के कोने-कोने तक जनगणना संबंधी संदेश और सूचनाएं पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी।
डिजिटल दौर से पहले डाक विभाग था जनगणना की रीढ़
वर्तमान में भारत की 16वीं जनगणना के मकान-सूचीकरण और आवास चरण का कार्य चल रहा है, जिसमें पहली बार मोबाइल एप्लिकेशन और स्वगणना (Self Enumeration) जैसी डिजिटल सुविधाओं का उपयोग किया जा रहा है। ऐसे समय में यह प्रदर्शनी उस दौर की याद दिलाती है जब जनगणना से जुड़े सभी कार्यों का समन्वय डाक विभाग के माध्यम से किया जाता था। जनगणना के प्रति जागरूकता फैलाने, अधिकारियों और प्रगणकों के बीच संवाद स्थापित करने, दस्तावेजों के आदान-प्रदान और जनसंपर्क जैसे कार्यों में भारतीय डाक सेवा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही थी।

छह दशकों के इतिहास को समेटे है प्रदर्शनी
अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक विकास कुमार द्वारा संयोजित इस प्रदर्शनी में वर्ष 1951 से 2011 तक की जनगणना से जुड़ी डाक सामग्री को प्रदर्शित किया गया है।
प्रदर्शनी में शामिल सामग्री में—
- सर्विस पोस्टकार्ड
- डाक टिकट
- प्रथम दिवस आवरण (First Day Covers)
- अंतर्देशीय पत्र
- सरकारी दस्तावेज
- जनगणना संबंधी पत्राचार
जैसी ऐतिहासिक वस्तुएं शामिल हैं।
इन दस्तावेजों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि किस प्रकार भारतीय डाक विभाग ने करोड़ों लोगों तक जनगणना का संदेश पहुंचाया और उन्हें राष्ट्र निर्माण की इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया।
झारखंड के जनगणना निदेशक ने किया उद्घाटन
रांची में आयोजित प्रदर्शनी का उद्घाटन झारखंड के जनगणना संचालन निदेशक प्रभात कुमार ने किया। इस अवसर पर उन्होंने जनगणना कार्यों में डाक विभाग की ऐतिहासिक भागीदारी को रेखांकित करते हुए इस अनूठे प्रयास की सराहना की। उन्होंने कहा कि जनगणना केवल जनसंख्या की गिनती नहीं है, बल्कि यह नीति निर्माण, विकास योजनाओं और संसाधनों के वितरण की आधारशिला भी है। ऐसे में जनगणना के इतिहास को समझना बेहद महत्वपूर्ण है।

विशेषज्ञों ने जनगणना के महत्व पर की चर्चा
प्रदर्शनी के उद्घाटन के बाद एक विशेष परिचर्चा का आयोजन भी किया गया। इसमें—
- अंजना सिंह (इतिहास विभाग, निर्मला कॉलेज)
- दीपाली अपराजिता डुंगडुंग (समाजशास्त्र विभाग, रांची विश्वविद्यालय)
- विकास कुमार (अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु) ने भाग लिया।
परिचर्चा का संचालन अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, रांची के कुणाल शाहदेव ने किया। चर्चा के दौरान वक्ताओं ने जनगणना को देश की विकास योजनाओं और नीति निर्माण का आधार बताते हुए कहा कि वर्षों तक भारतीय डाक विभाग ने जनगणना के प्रचार-प्रसार, सामग्री वितरण और अधिकारियों के बीच संचार व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जम्मू, बेंगलुरु और लखनऊ के बाद रांची में आयोजन
यह प्रदर्शनी इससे पहले जनवरी 2026 में जम्मू, फरवरी 2026 में बेंगलुरु और लखनऊ में भी आयोजित की जा चुकी है। रांची इसका चौथा प्रमुख पड़ाव है। आयोजकों के अनुसार प्रदर्शनी 6 जून की शाम 5 बजे तक आम लोगों के लिए खुली रहेगी, जहां छात्र, शोधार्थी, इतिहास प्रेमी और आम नागरिक जनगणना और डाक विभाग के इस अनोखे संबंध को करीब से समझ सकते हैं।
इतिहास और जनभागीदारी की अनूठी झलक
“गिनती में आओ: भारत में जनगणना का डाक इतिहास” केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि उस दौर का दस्तावेजी प्रमाण है जब डाकिया ही सरकार और नागरिकों के बीच संवाद का सबसे मजबूत माध्यम हुआ करता था। यह आयोजन नई पीढ़ी को यह समझाने का प्रयास है कि डिजिटल युग से पहले देश के सबसे बड़े प्रशासनिक अभियानों में भारतीय डाक विभाग की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है।






