गरीबों के हक पर डाका: गुमला में प्रधानमंत्री आवास योजना में बड़ा घोटाला
अधूरा घर तोड़कर मिटाए गए सबूत
गुमला: झारखंड के आदिवासी बहुल गुमला जिले से प्रधानमंत्री आवास योजना में भारी अनियमितता और संभावित घोटाले का मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि गरीबों के अधिकारों पर भी सीधा प्रहार किया है। सिसई प्रखंड के नागफेनी गांव में एक ऐसा मामला उजागर हुआ है, जिसमें आरोप है कि लाभुक द्वारा अधूरे मकान को कागजों में पूर्ण दिखाकर पूरी राशि निकाल ली गई और बाद में उस मकान को जेसीबी से तुड़वा दिया गया, ताकि सच्चाई सामने न आ सके।
लिंटल तक निर्माण, लेकिन पूरा दिखाकर निकाला गया पैसा
ग्रामीणों के अनुसार, नागफेनी गांव की रहने वाली शंकरी देवी को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर स्वीकृत किया गया था। इस आवास का निर्माण खाता संख्या 85 और प्लॉट संख्या 1401 की जमीन पर शुरू हुआ था। लेकिन निर्माण कार्य केवल लिंटल स्तर तक ही पहुंच पाया। इसके बावजूद, योजना के तहत पूरा आवास तैयार दिखाते हुए संबंधित अधिकारियों और कर्मियों की कथित मिलीभगत से पूरी राशि की निकासी कर ली गई। यह सवाल उठना लाजमी है कि जब घर अधूरा था, तो उसे पूर्ण कैसे दिखाया गया और भुगतान कैसे जारी हुआ?
जमीन की बिक्री और फिर मकान का ध्वस्तीकरण
मामले को और गंभीर बनाते हुए ग्रामीणों ने बताया कि लाभुक के बेटे पवन सिंह ने उस जमीन को बाद में बेच दिया। इसके बाद अधूरे मकान को जेसीबी मशीन से तुड़वा दिया गया। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह कदम जानबूझकर उठाया गया, ताकि निर्माण की वास्तविक स्थिति छिपाई जा सके और किसी जांच की स्थिति में कोई ठोस सबूत न बचे। यह पूरी प्रक्रिया एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करती है, जिसमें सरकारी पैसे के दुरुपयोग को छिपाने की कोशिश की गई।
ग्रामीणों का आरोप: बिना मिलीभगत संभव नहीं
गांव के लोगों का कहना है कि यह मामला किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं हो सकता। उनका साफ आरोप है कि प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े स्थानीय कर्मियों, अधिकारियों और लाभुक के बीच मिलीभगत के बिना यह संभव नहीं था। ग्रामीणों ने कहा कि जब तक प्रशासनिक स्तर पर सहयोग न मिले, तब तक अधूरे मकान को पूर्ण दिखाकर भुगतान लेना संभव ही नहीं है।
अधिकारी का गोलमोल जवाब, बढ़े सवाल
जब इस पूरे मामले पर सिसई प्रखंड के प्रधानमंत्री आवास समन्वयक आयता मिंज से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने स्पष्ट जानकारी देने के बजाय गोलमोल जवाब दिया। उन्होंने कहा कि आवास बनने के बाद वह लाभुक की निजी संपत्ति हो जाती है और उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि उसे तोड़ा या बेचा जा सकता है या नहीं। यह बयान कई गंभीर सवाल खड़े करता है—क्या योजना की निगरानी की कोई जवाबदेही नहीं है? क्या अधिकारी सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित हैं?
नागफेनी गांव में बड़े स्तर पर गड़बड़ी की आशंका
ग्रामीणों ने दावा किया है कि यह मामला अकेला नहीं है। उनके अनुसार नागफेनी गांव में प्रधानमंत्री आवास और अबुआ आवास योजना के तहत कई ऐसे मामले हैं, जहां मकान का निर्माण नहीं हुआ, लेकिन कागजों में पूरा दिखाकर पैसे की निकासी कर ली गई। अगर इस पूरे गांव में निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो कई बड़े घोटालों का खुलासा हो सकता है।
गरीबों के लिए बनी योजना में भ्रष्टाचार का जाल
गौरतलब है कि गुमला जिला एक अति पिछड़ा और आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां आज भी बड़ी संख्या में लोग कच्चे मकानों में रहने को मजबूर हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाएं गरीबों के लिए उम्मीद की किरण होती हैं। लेकिन जब इसी योजना में भ्रष्टाचार और गबन के आरोप सामने आते हैं, तो यह न सिर्फ प्रशासनिक विफलता बल्कि सामाजिक अन्याय भी है।
जांच की मांग, कार्रवाई का इंतजार
ग्रामीणों ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की बात कही है। उनका कहना है कि अगर समय रहते इस तरह की गड़बड़ियों पर रोक नहीं लगाई गई, तो सरकार की योजनाओं का लाभ असली जरूरतमंदों तक कभी नहीं पहुंच पाएगा।
गुमला का यह मामला सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की तस्वीर है, जहां कागजों पर विकास होता है और जमीनी हकीकत में गरीब ठगा जाता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इस मामले में सख्ती दिखाएगा और दोषियों को सजा मिलेगी, या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।






