झारखंड में 25 साल बाद लागू हुआ PESA कानून, ग्राम स्वशासन को मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम
झारखंड का PESA मॉडल सबसे बेहतर : दीपिका पांडेय सिंह
आदिवासी स्वशासन को मिलेगा नया आधार
रांची: झारखंड में अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम स्वशासन और पारंपरिक ग्राम सभाओं को संवैधानिक ताकत देने की दिशा में ऐतिहासिक पहल करते हुए पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम यानी Panchayat Extension to Scheduled Areas Act (PESA) कानून लागू कर दिया गया है।
राज्य में इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर धुर्वा स्थित प्रोजेक्ट भवन के एनेक्सी सभागार में राज्यस्तरीय कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें विभिन्न जिलों के उप विकास आयुक्त, बीडीओ, सीओ और प्रशासनिक अधिकारियों ने भाग लिया। कार्यशाला का आयोजन पंचायती राज विभाग द्वारा किया गया।
“25 वर्षों का इंतजार अब खत्म”
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए झारखंड की ग्रामीण विकास, ग्रामीण कार्य एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि राज्य में PESA कानून लागू होना ऐतिहासिक उपलब्धि है।उन्होंने कहा कि झारखंड गठन के 25 वर्षों बाद अब जाकर पारंपरिक ग्राम सभाओं और आदिवासी स्वशासन की अवधारणा को संवैधानिक रूप से मजबूत आधार मिला है।
मंत्री ने कहा कि यह केवल कानून लागू करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज की परंपराओं, संस्कृति और स्वायत्त व्यवस्था को सम्मान देने का प्रयास है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सोच का परिणाम
दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की स्पष्ट सोच थी कि राज्य में पारंपरिक ग्राम व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दी जाए और ग्राम सभाओं को उनका अधिकार मिले। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर लंबे विचार-विमर्श, अध्ययन और विभिन्न स्तरों पर चर्चा के बाद PESA नियमावली तैयार की गई। मंत्री ने कहा कि यह कानून केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और स्थानीय भागीदारी की दिशा में बड़ा कदम है।
“झारखंड का PESA मॉडल सबसे बेहतर”
मंत्री ने दावा किया कि देश के जिन राज्यों में PESA कानून लागू होना था, उनमें झारखंड की नियमावली सबसे अधिक प्रभावी और व्यवहारिक मानी जा रही है। उन्होंने कहा कि कानून को लेकर कुछ जगहों पर भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है, लेकिन इसकी मूल भावना ग्राम सभा को मजबूत करना और स्थानीय समुदाय को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना है। उन्होंने कहा कि गांवों के लोगों की अधिकांश समस्याओं और सवालों का समाधान PESA नियमावली के भीतर ही मौजूद है।
ग्राम प्रधान चयन पर विशेष जोर
कार्यशाला के दौरान मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि पारंपरिक व्यवस्था के अनुसार तीन महीने के भीतर ग्राम प्रधानों की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि ग्राम सभा के माध्यम से पारंपरिक तरीके से ग्राम प्रधान का चयन ही PESA कानून की आत्मा है। मंत्री ने अधिकारियों से कहा कि वे पारंपरिक ग्राम प्रधान और राजस्व ग्राम प्रधान के बीच के अंतर को गंभीरता से समझें और उसी के अनुरूप कार्य करें।

“गांव की भागीदारी के बिना कानून सफल नहीं होगा”
दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि किसी भी कानून की सफलता जनता की भागीदारी पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि यदि ग्राम सभा, ग्रामीण समुदाय और प्रशासन एक साथ मिलकर काम करें, तभी PESA कानून का वास्तविक लाभ गांवों तक पहुंचेगा। उन्होंने अधिकारियों से अपील की कि वे इसे केवल सरकारी योजना की तरह न देखें, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के रूप में कार्य करें।
क्षेत्रीय भाषाओं में नियमावली तैयार
कार्यशाला को संबोधित करते हुए पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार ने कहा कि PESA कानून को गांवों तक पहुंचाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों को बेहतर समझ देने के लिए नियमावली का विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद कराया गया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय भाषा के माध्यम से ही जागरूकता प्रभावी रूप से पहुंचाई जा सकती है।
125 मास्टर ट्रेनर तैयार
सचिव ने बताया कि PESA कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्यभर में 125 मास्टर ट्रेनरों को प्रशिक्षित किया गया है। ये ट्रेनर विभिन्न जिलों और प्रखंडों में जाकर अधिकारियों, ग्राम सभाओं और स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य कानून को केवल कागजों तक सीमित न रखकर व्यवहारिक स्तर पर लागू करना है।
तकनीकी सत्रों में गहन चर्चा
कार्यशाला के दौरान तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें PESA कानून के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इन सत्रों में ग्राम सभा की भूमिका, सामुदायिक भागीदारी, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार, स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी और पारंपरिक न्याय व्यवस्था जैसे विषय शामिल रहे। विशेषज्ञों ने कहा कि PESA कानून का उद्देश्य केवल प्रशासनिक विकेंद्रीकरण नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाना है।

चुनौतियों को दूर करने के लिए कमेटी गठित
पंचायती राज निदेशालय की निदेशक बी. राजेश्वरी ने कहा कि कानून लागू होने के बाद कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आई हैं। इन चुनौतियों के समाधान के लिए निदेशक स्तर पर विशेष कमेटी का गठन किया गया है, जो विभिन्न बाधाओं का अध्ययन कर रही है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक न्याय व्यवस्था और स्थानीय प्रशासनिक संरचना का भी अध्ययन किया जा रहा है, ताकि नियमावली को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
अधिकारियों के बीच खुला संवाद
कार्यशाला के दौरान अधिकारियों और विशेषज्ञों के बीच खुला संवाद भी आयोजित किया गया। इस दौरान विभिन्न जिलों के अनुभव साझा किए गए और बेहतर क्रियान्वयन को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। अधिकारियों ने माना कि PESA कानून को सफल बनाने के लिए जमीनी स्तर पर निरंतर प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान जरूरी होंगे।

आदिवासी स्वशासन को मिलेगा नया आधार
विशेषज्ञों का मानना है कि PESA कानून लागू होने से आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका और मजबूत होगी। ग्राम सभाओं को स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक व्यवस्था और सामुदायिक निर्णयों में अधिक अधिकार मिलने की संभावना है। इससे ग्रामीण समुदायों की भागीदारी बढ़ेगी और स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी।
झारखंड में 25 वर्षों बाद लागू हुआ PESA कानून राज्य की पारंपरिक ग्राम स्वशासन व्यवस्था के लिए ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। अब सरकार की सबसे बड़ी चुनौती इसे प्रभावी ढंग से गांव-गांव तक लागू करना है, ताकि आदिवासी समाज को संवैधानिक अधिकारों का वास्तविक लाभ मिल सके और ग्राम सभाएं विकास की मुख्य धुरी बन सकें।






