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धरती आबा बिरसा मुंडा: 150वीं जयंती पर पूरे देश में गूंजा उलगुलान का संदेश

Birsa Munda Jayanti

रांची/खूंटी : भारत आज उस वीर महानायक को नमन कर रहा है, जिसने केवल 25 वर्ष की अल्पायु में अंग्रेजी शासन की नींव हिलाकर रख दी थी। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा, जिन्हें आदिवासी समाज देवत्व का दर्जा देता है, आज पूरे देश में जनजातीय गौरव दिवस के केंद्र में हैं। 15 नवंबर 1875 को खूंटी जिले के उलिहातू गांव में जन्मे बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर झारखंड से लेकर दिल्ली तक विशेष आयोजन हो रहे हैं। झारखंड में इस वर्ष को ‘जनजातीय गौरव वर्ष 2025’ के रूप में मनाया जा रहा है।

“राष्ट्रीय महानायक”: संघर्ष की वह ज्योति जिसने पूरे देश को जगाया
बिरसा मुंडा ने केवल आदिवासियों को ही नहीं, बल्कि उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ पूरे समाज को एकजुट कर एक ऐसी लड़ाई छेड़ी, जिसका असर न केवल छोटानागपुर बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की धारा में भी गूंजा। अंग्रेजों के खिलाफ उलगुलान (महा-विद्रोह) की चिंगारी जगाने वाले बिरसा मुंडा आज शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं।

बिरसा मुंडा का कद: ‘भगवान’ के रूप में आस्था
झारखंड के आदिवासी समाज में बिरसा मुंडा भगवान के रूप में पूजे जाते हैं। उनकी पूजा सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि संघर्ष, स्वाभिमान, एकता और अधिकारों के लिए लड़ने की भावना का प्रतीक है। पिछले एक दशक में बिरसा की लोकप्रियता पूरे देश में तेजी से बढ़ी है। आज उन्हें राष्ट्रीय नायक, प्रेरणास्रोत और संघर्ष-पुरुष के रूप में स्वीकार किया जाता है।

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उलगुलान का इतिहास: कैसे बनी एक युवा की विरासत?
बिरसा मुंडा के संघर्ष को दुनिया तक पहुंचाने की यात्रा लंबी रही। 1900 में उनकी मृत्यु के बाद पहली बार अंग्रेज अधिकारी ब्रेडले बर्ट ने अपनी किताब ‘Chhota Nagpur: A Little Known Province of the Empire’ में बिरसा के आंदोलन का उल्लेख किया।

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1912 में प्रसिद्ध मानवशास्त्री एस.सी. राय चौधरी ने अपनी मशहूर पुस्तक
‘The Mundas and Their Country’ में पहली बार बिरसा मुंडा की तस्वीर और संघर्ष का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया।1926 में फादर हॉफमैन ने Mundarica Encyclopaedia में उनकी लड़ाई पर शोध किया। इस प्रकार बिखरी हुई जानकारियां धीरे-धीरे एक आंदोलन का इतिहास बनती गईं।

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जयपाल सिंह और संगठित झारखंड आंदोलन में बिरसा की पुनर्स्थापना
1939 में आदिवासी महासभा के नेतृत्व में आते ही जयपाल सिंह मुंडा ने बिरसा के नाम को जनता तक पहुंचाया। मार्च 1939 के विशेषांक में बिरसा की हथकड़ी लगी तस्वीर प्रकाशित की गई— यह पहला अवसर था जब लाखों लोगों के बीच किसी मंच से “महात्मा बिरसा” का जयघोष हुआ। यही वह दौर था जब झारखंड आंदोलन की वैचारिक धारा ने जन-जन में उलगुलान की चेतना जगानी शुरू की।

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डोंबारी बुरू: जहां गोलियां चलीं, लेकिन विचार अमर हो गए
खूंटी का ऐतिहासिक पर्वत डोंबारी बुरू आज भी बिरसा मुंडा के उलगुलान का सबसे बड़ा साक्षी है।
यहां अंग्रेजी सेना ने निहत्थों पर गोलियां चलाईं, कई मुंडा योद्धाओं ने प्राण गंवाए, लेकिन आंदोलन नहीं रुका। आज भी जब लोग डोंबारी बुरू पहुंचते हैं, तो वह केवल श्रद्धांजलि नहीं देते—,बल्कि इतिहास के उस क्षण को महसूस करते हैं जहाँ एक युवा नेता ने कहा था:

“अबुआ दिसुम, अबुआ राज” — अपना देश, अपना राज। डोंबारी बुरू आज भी बताता है कि शरीर मारा जा सकता है, लेकिन विचार कभी नहीं मरते।

धरती आबा की 150वीं जयंती: झारखंड से राष्ट्र तक उत्सव का माहौल
देशभर में कार्यक्रम, जनजातीय पखवाड़ा, सांस्कृतिक आयोजन, प्रदर्शनी, शौर्य दिवस और स्मृति समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक, हर मंच पर आज बिरसा मुंडा का संघर्ष और उनकी विरासत को सम्मान दिया जा रहा है।

झारखंड में 15–16 नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के साथ-साथ बिरसा मुंडा 150वीं जयंती को भव्य रूप से मनाया जा रहा है।

संघर्ष, स्वाभिमान और स्वराज का प्रतीक
धरती आबा बिरसा मुंडा का जीवन संदेश हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा है— कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए उम्र की नहीं, संकल्प की जरूरत होती है। उनका उलगुलान हमें आज भी याद दिलाता है कि,विचार अमर होते हैं, और संघर्ष कभी बेकार नहीं जाता।

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