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दुमका बयान पर सियासी तूफ़ान: मरांडी बनाम सोरेन आमने-सामने

Political Controversy

Ranchi : झारखंड की सियासत एक बार फिर गर्म हो गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर तीखा हमला बोला है। मामला दुमका में आयोजित झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के स्थापना दिवस समारोह में दिए गए एक बयान से जुड़ा है, जिसकी एक क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है।

क्या था मुख्यमंत्री का बयान?
दुमका में आयोजित रैली के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने असम दौरे का जिक्र करते हुए कहा था कि असम के चाय बागानों में वर्षों पहले ले जाए गए झारखंड के आदिवासी आज भी अपनी पहचान और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि वहां के आदिवासियों को अब तक पूरा संवैधानिक दर्जा नहीं मिला है और वे कई तरह की कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि झारखंड सरकार असम के आदिवासियों की लड़ाई में उनके साथ खड़ी है और जरूरत पड़ी तो झारखंड के आदिवासियों को भी उनके समर्थन में ले जाया जाएगा।

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मरांडी का पलटवार
इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया पर वीडियो क्लिप साझा कर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि झारखंड के आदिवासी किसी की “राजनीतिक जागीर” नहीं हैं, जिन्हें जब चाहा, जहां चाहा ले जाकर भीड़ का हिस्सा बना दिया जाए।

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उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आदिवासी समाज उन विधायकों की तरह नहीं है जिन्हें बसों में भरकर दूसरी जगह भेज दिया जाए। मरांडी ने इस बयान को “राजनीतिक रूप से गैरजिम्मेदाराना” करार दिया।

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शिबू सोरेन पर भी टिप्पणी
मरांडी ने अपने बयान में दिवंगत शिबू सोरेन का भी जिक्र किया और कहा कि झारखंड आंदोलन की भावनाओं के साथ कभी समझौता नहीं होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी समाज अब जागरूक हो चुका है और किसी भी तरह के राजनीतिक इस्तेमाल को समझता है।

आदिवासी सुरक्षा पर सवाल
नेता प्रतिपक्ष ने राज्य सरकार पर आदिवासी हितों की अनदेखी का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य में आदिवासी नेताओं और युवाओं की हत्या की घटनाएं हुई हैं और कई स्थानों पर आदिवासी जमीन से जुड़े विवाद सामने आए हैं।

मरांडी ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ इलाकों में बाहरी लोगों की बसावट को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष है। हालांकि इन आरोपों पर राज्य सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।

पेसा कानून पर भी उठाए सवाल
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि पेसा कानून के नाम पर आदिवासी स्वशासन की मूल भावना से समझौता किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि परंपरागत व्यवस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है और जल, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दों पर आदिवासी हितों की अनदेखी हो रही है।

सियासत तेज होने के संकेत
दुमका के बयान से शुरू हुआ यह विवाद अब राज्य की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है। एक ओर मुख्यमंत्री का बयान आदिवासी एकजुटता और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित बताया जा रहा है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक उकसावे के रूप में पेश कर रहा है।

आने वाले दिनों में यह मुद्दा झारखंड की राजनीति में और गरमाने की पूरी संभावना है।

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