JPSC घोटाले की जांच में बड़ा खुलासा! 70 लाख तक ‘रेट’, 3 सदस्यों पर अभ्यर्थियों की सेटिंग के आरोप
रांची: झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC परीक्षा घोटाले की जांच में अब एक ऐसा मोड़ सामने आया है, जिसने पूरी भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोपी अभय तिवारी के CID को दिए कथित बयान में JPSC के तीन सदस्यों—अजीता भट्टाचार्य, जमाल अहमद और अनीमा हांसदा—की कथित भूमिका को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं।यहां साफ कर देना जरूरी है कि ये आरोप जांच में सामने आए कथित बयानों पर आधारित हैं और इनकी स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि होना बाकी है। संबंधित आरोपियों का पक्ष या अदालत का अंतिम निष्कर्ष ही इन दावों की वास्तविक स्थिति तय करेगा। लेकिन अगर जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो मामला सिर्फ परीक्षा में अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा… बल्कि सरकारी नौकरी के लिए कथित तौर पर पैसे के बदले सेटिंग के संगठित नेटवर्क की तस्वीर सामने आ सकती है।
11वीं से 13वीं JPSC परीक्षा में कथित ‘रेट’ का दावा
अभय तिवारी के कथित बयान के अनुसार 11वीं से 13वीं JPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए कथित तौर पर 5 लाख रुपये और ST-SC अभ्यर्थियों के लिए 2 से 3 लाख रुपये तक का रेट बताया गया। वहीं अंतिम परिणाम तक पहुंचाने के लिए कथित तौर पर 60 से 70 लाख रुपये प्रति अभ्यर्थी तक की रकम की बात सामने आई है। यानी कथित नेटवर्क में परीक्षा के अलग-अलग चरणों के लिए अलग-अलग रकम तय होने का दावा किया गया है। अब सबसे बड़ा सवाल—क्या वास्तव में परीक्षा प्रक्रिया को चरण-दर-चरण प्रभावित करने के लिए कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा था?
तीन JPSC सदस्यों पर कथित भूमिका के आरोप
अभय तिवारी के कथित बयान में JPSC सदस्य अजीता भट्टाचार्य, जमाल अहमद और अनीमा हांसदा के नाम सामने आने का दावा किया गया है। बयान के मुताबिक अभय ने TDPL के निदेशक रामवीर सिंह के माध्यम से इन सदस्यों तक अभ्यर्थियों की कथित पैरवी पहुंचाई। दावे के अनुसार, आदित्य पांडेय नामक व्यक्ति के माध्यम से अभ्यर्थियों को अजीता भट्टाचार्य के कथित PA ब्रजराम, TDPL निदेशक रामवीर सिंह, जमाल अहमद, अनीमा हांसदा और तत्कालीन JPSC चेयरमैन एल खियांग्ते तक पहुंचाने की बात कही गई है।
यह पूरा दावा अब CID जांच के दायरे में है।
सात अभ्यर्थियों को कथित लाभ का दावा
अभय तिवारी के कथित बयान में दावा किया गया है कि इस कथित सेटिंग से कुल सात अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया। इसके बदले कथित तौर पर प्रति अभ्यर्थी 15 लाख रुपये वसूले गए। बयान में यह भी दावा किया गया है कि इंटरव्यू से संबंधित कथित रकम अजीता भट्टाचार्य के PA ब्रजराम तक पहुंचाई जाती थी। वहीं तत्कालीन चेयरमैन एल खियांग्ते के संबंध में भी पैसे के लेन-देन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन दावों की पुष्टि जांच एजेंसी और न्यायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साक्ष्यों से ही होगी।
इंटरव्यू बोर्ड और ‘कोड डी-कोड’ का दावा
मामले में सबसे गंभीर आरोप इंटरव्यू प्रक्रिया को कथित तौर पर प्रभावित करने को लेकर है। अभय तिवारी के कथित बयान के मुताबिक तीनों सदस्यों की ओर से TDPL के निदेशक रामवीर सिंह पर अभ्यर्थियों के इंटरव्यू कोड को कथित तौर पर डी-कोड कराने का दबाव बनाया जाता था। दावा यह भी है कि इंटरव्यू से एक दिन पहले कथित तौर पर कोड की जानकारी हासिल की जाती थी, ताकि संबंधित अभ्यर्थी को किसी खास बोर्ड में भेजा जा सके। अगर जांच में यह आरोप साबित होता है, तो यह इंटरव्यू प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बेहद गंभीर सवाल होगा। क्योंकि प्रतियोगी परीक्षा में अभ्यर्थी की पहचान कोड के जरिए गोपनीय रखना पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता का अहम हिस्सा होता है।
जमाल अहमद पर भी दलालों के जरिए सेटिंग का आरोप
कथित बयान में JPSC सदस्य जमाल अहमद पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। दावा किया गया है कि हजारीबाग के कुछ कथित दलालों के माध्यम से अभ्यर्थियों की सेटिंग कराई जाती थी और इसकी जानकारी TDPL निदेशक रामवीर सिंह तक पहुंचाई जाती थी। अब जांच एजेंसी के सामने बड़ा सवाल होगा कि कथित तौर पर संपर्क कराने वाले लोग कौन थे और अभ्यर्थियों से पैसे के लेन-देन का कोई दस्तावेजी या डिजिटल सबूत मौजूद है या नहीं।

CDPO परीक्षा में भी पैसे की कथित वसूली
मामला सिर्फ JPSC सिविल सेवा परीक्षा तक सीमित होने का दावा नहीं है। अभय तिवारी के कथित बयान में CDPO परीक्षा में भी अभ्यर्थियों से पैसे लिए जाने का दावा किया गया है। बताया गया है कि प्रति अभ्यर्थी कथित रेट 10 लाख रुपये था। एक अभ्यर्थी रजक के इंटरव्यू बोर्ड को लेकर तत्कालीन चेयरमैन एल खियांग्ते का नाम सामने आया है और कथित तौर पर 15 लाख रुपये दिए जाने का दावा किया गया है। इसी तरह काजल भारती के इंटरव्यू बोर्ड के संबंध में अजीता भट्टाचार्य का नाम लेते हुए उनके कथित PA ब्रजराम को 10 लाख रुपये दिए जाने का दावा किया गया है। एक बार फिर—ये सभी दावे जांच में सामने आए कथित बयानों पर आधारित हैं, और इन्हें अदालत द्वारा सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।
रामवीर सिंह के कथित कबूलनामे का भी उल्लेख
मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि अभय तिवारी के कथित बयान के साथ रामवीर सिंह के कथित कबूलनामे का भी उल्लेख सामने आया है। अगर जांच एजेंसी इन दोनों बयानों को स्वतंत्र साक्ष्यों से जोड़ पाती है, तो कथित नेटवर्क की पूरी संरचना सामने आ सकती है। जांच का फोकस अब कथित पैसे के लेन-देन, अभ्यर्थियों की पहचान, एजेंटों की भूमिका, परीक्षा से जुड़े डेटा और इंटरव्यू बोर्ड की प्रक्रिया पर हो सकता है।
लाखों युवाओं के भरोसे का सवाल
JPSC की परीक्षा झारखंड के हजारों-लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ी होती है। अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं और उम्मीद करते हैं कि चयन सिर्फ योग्यता के आधार पर होगा। ऐसे में अगर पैसे लेकर कथित तौर पर अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाने के आरोप सामने आते हैं, तो यह सिर्फ एक परीक्षा का विवाद नहीं रह जाता। यह सवाल बन जाता है कि क्या ईमानदारी से तैयारी करने वाले युवाओं के साथ व्यवस्था न्याय कर रही थी?
अब CID जांच में यह साफ होना बाकी है कि अभय तिवारी के कथित बयान में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है, कौन-कौन लोग वास्तव में इस नेटवर्क का हिस्सा थे और कथित आर्थिक लेन-देन के क्या प्रमाण मौजूद हैं। क्योंकि JPSC विवाद में असली लड़ाई सिर्फ कुछ अभ्यर्थियों के चयन की नहीं… यह झारखंड के उन लाखों युवाओं के भरोसे की लड़ाई है, जो मानते हैं कि सरकारी नौकरी पैसे से नहीं, योग्यता से मिलनी चाहिए।






