JSSC CGL रद्द होते ही 1975 नौकरियां खत्म! भारी बारिश में प्रोजेक्ट भवन के बाहर प्रदर्शन
चयनित कर्मियों का सवाल—अगर गड़बड़ी हुई तो दोषियों पर कार्रवाई हो, निर्दोषों को सजा क्यों
कल तक सचिवालय में संभाल रहे थे जिम्मेदारी, आज उसी गेट पर रोक दिए गए
रांची: झारखंड में JSSC CGL परीक्षा रद्द किए जाने का फैसला अब सरकार और आंदोलनरत छात्रों के साथ-साथ चयनित अभ्यर्थियों के बीच भी बड़ा टकराव पैदा करता दिख रहा है। सोमवार को राज्य सरकार की ओर से JSSC CGL परीक्षा और उससे जुड़ी नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले के अगले ही दिन मंगलवार को चयनित 1975 कर्मियों को प्रोजेक्ट भवन यानी सचिवालय में प्रवेश करने से रोक दिया गया। भारी बारिश के बीच ये कर्मचारी सचिवालय के मुख्य गेट के बाहर बैठकर प्रदर्शन करते नजर आए। कभी जिन हाथों में सरकारी फाइलें थीं, वही हाथ आज अपने रोजगार को बचाने की गुहार लगा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें सेवा समाप्त किए जाने का कोई स्पष्ट लिखित नोटिस नहीं दिया गया, लेकिन सचिवालय में प्रवेश से रोक दिया गया है।
एक आदेश और बदल गई पूरी जिंदगी
JSSC CGL 2023 के जरिए 1975 अभ्यर्थियों का विभिन्न पदों पर चयन हुआ था। इनमें ASO, CI, BSO, BWO, LEO, प्लानिंग असिस्टेंट और JSA जैसे पद शामिल हैं। चयनित अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने इस नौकरी के लिए वर्षों तक मेहनत की। कई उम्मीदवारों ने दूसरी सरकारी नौकरियां तक छोड़ दीं और झारखंड में नियुक्ति लेकर सेवा शुरू की। लेकिन सरकार के परीक्षा रद्द करने के फैसले के बाद उनकी पूरी स्थिति अचानक बदल गई। प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों का सवाल है—अगर परीक्षा में गड़बड़ी हुई है तो जांच हो, दोषियों की पहचान हो और उनके खिलाफ कार्रवाई हो। लेकिन पूरी चयन प्रक्रिया में शामिल हर अभ्यर्थी को एक साथ दोषी मानकर नौकरी खत्म करना कहां तक उचित है?




भारी बारिश में सचिवालय गेट पर बैठे कर्मचारी
मंगलवार को प्रोजेक्ट भवन के बाहर स्थिति उस समय बेहद भावुक हो गई, जब भारी बारिश के बावजूद चयनित कर्मचारी गेट के बाहर डटे रहे।प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें काम पर नहीं आने संबंधी कोई लिखित नोटिस नहीं मिला है। इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें सचिवालय के अंदर प्रवेश करने से रोक दिया। युवाओं का कहना है कि वे सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने भविष्य और न्याय के लिए आवाज उठा रहे हैं। उनकी मांग है कि सरकार पहले पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए और उसके बाद दोषी पाए जाने वाले लोगों पर कार्रवाई करे।





LEO आशीष मिंज ने सुनाई अपनी कहानी
खूंटी में लेबर एनफोर्समेंट ऑफिसर यानी LEO के पद पर कार्यरत आशीष मिंज ने बताया कि उन्होंने नौकरी पाने के लिए लंबा संघर्ष किया था। उनके मुताबिक, उन्होंने 2019 से 2022 तक LIC में डेवलपमेंट ऑफिसर के रूप में काम किया और इसके बाद भारतीय खाद्य निगम यानी FCI में भी सेवा दी। उन्होंने इन नौकरियों को छोड़कर JSSC CGL के जरिए मिली नियुक्ति को चुना। अब परीक्षा रद्द होने के बाद उनका कहना है कि उनके सामने वापस लौटने का रास्ता भी आसान नहीं है। उनका सवाल है कि बिना किसी व्यक्तिगत दोष को साबित किए उनकी सेवा क्यों समाप्त की जा रही है?
ASO प्रिंस प्रियदर्शी का बड़ा सवाल
प्रदर्शन में शामिल असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर प्रिंस प्रियदर्शी ने भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि JSSC CGL के जरिए नियुक्तियां हाईकोर्ट के विस्तृत फैसले और सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद हुई थीं। उनके मुताबिक, नियुक्ति पत्र की शर्तों में भी दोषी पाए जाने वाले अभ्यर्थियों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान था। ऐसे में उनका सीधा सवाल है—“अगर हम दोषी नहीं हैं तो हमें किस बात की सजा दी जा रही है?”
दोषी कौन, इसकी जांच जरूरी
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल बन चुका है। एक तरफ सरकार और जांच एजेंसियां JSSC CGL परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच कर रही हैं। दूसरी तरफ परीक्षा पास कर नियुक्ति पाने वाले हजारों युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का कहना है कि अगर जांच में किसी अधिकारी, कर्मचारी, अभ्यर्थी या किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन सामूहिक रूप से पूरी नियुक्ति रद्द करने के बजाय व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
सरकार के फैसले के बाद बढ़ा टकराव
JSSC CGL को लेकर छात्रों का आंदोलन पहले से ही सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था। छात्रों की मांगों के दबाव के बीच परीक्षा रद्द करने का फैसला जरूर हुआ, लेकिन अब चयनित कर्मचारियों का आंदोलन सामने आ गया है। यानी सरकार के सामने अब दो अलग-अलग सवाल खड़े हैं—परीक्षा में कथित गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच कैसे हो और जिन अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिली, उनके भविष्य की रक्षा कैसे की जाए? प्रोजेक्ट भवन के बाहर बारिश में बैठे चयनित कर्मचारी यही सवाल सरकार से पूछ रहे हैं। उनकी मांग साफ है—“अगर गड़बड़ी हुई है तो दोषियों को सजा दीजिए, लेकिन निर्दोषों की नौकरी मत छीनिए।”
अब देखना यह है कि सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार करती है या चयनित 1975 कर्मचारियों की लड़ाई आगे अदालत और सड़कों तक पहुंचती है। फिलहाल भारी बारिश में सचिवालय के बाहर बैठे ये कर्मचारी सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि अपने वर्षों की मेहनत, भविष्य और न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं।






