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धर्मांतरण और ST आरक्षण पर चंपई सोरेन का बड़ा बयान, अनुच्छेद 342 में बदलाव की उठाई मांग

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रांची: चंपई सोरेन ने धर्मांतरण, आदिवासी पहचान और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि झारखंड हाई कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में राज्य के एक मंत्री के जाति प्रमाण पत्र पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। चंपई सोरेन ने दावा किया कि याचिका में कहा गया है कि संबंधित जाति प्रमाण पत्र के एफिडेविट में धर्म के स्थान पर “ईसाई” लिखा गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती, तो अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी किया गया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का दिया हवाला
चंपई सोरेन ने अपने बयान में Supreme Court of India की हालिया टिप्पणियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाता है और सक्रिय रूप से उसका पालन या प्रचार करता है, तो वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि 27 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण और अन्य अधिकार लेने की कोशिश को “संविधान के साथ धोखाधड़ी” करार दिया था।

“आरक्षित सीटों पर धर्मांतरित लोग काबिज”
चंपई सोरेन ने आरोप लगाया कि धर्मांतरण के बाद भी कई लोग आदिवासियों के लिए आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरियों में भी ST वर्ग के लिए आरक्षित कई पदों पर ऐसे लोग कब्जा किए हुए हैं, जिससे मूल आदिवासी समाज के बच्चों और युवाओं को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

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आदिवासी संस्कृति पर खतरे की चिंता
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी अलग जीवनशैली, पूजा पद्धति, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति पूजा करने वाला समाज है, जहां जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक अपनी अलग सामाजिक व्यवस्था और रीति-रिवाज हैं। चंपई सोरेन ने सवाल उठाया कि यदि धर्मांतरण लगातार बढ़ता रहा तो भविष्य में सरना स्थल, जाहेरस्थान और देशाउली जैसी पारंपरिक धार्मिक स्थलों की परंपरा कौन निभाएगा।

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वैश्विक उदाहरणों का भी किया जिक्र
उन्होंने कहा कि दुनिया के कई आदिवासी समुदाय धर्मांतरण के बाद अपनी मूल संस्कृति और परंपराओं से दूर हो गए। इसी संदर्भ में उन्होंने लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और प्रशांत क्षेत्र की कई जनजातियों का उदाहरण देते हुए कहा कि धर्मांतरण के बाद वहां पारंपरिक भाषा, नृत्य, पूजा-पद्धति और सामाजिक संरचना कमजोर पड़ गई।

“डीलिस्टिंग” की उठाई मांग
चंपई सोरेन ने कहा कि केंद्र सरकार को आदिवासी समाज के अस्तित्व पर आए संकट को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने मांग की कि या तो “डीलिस्टिंग” की प्रक्रिया लागू की जाए या फिर संविधान के Article 342 में आवश्यक संशोधन किए जाएं। उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन करने वालों को आदिवासी आरक्षण और विशेष संवैधानिक अधिकारों का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

धर्मांतरण रोकने की अपील
पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि कुछ लोग आदिवासियों को लालच, डर या मजबूरी का फायदा उठाकर धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रवृत्ति को रोकना जरूरी है, अन्यथा भविष्य में आदिवासी संस्कृति और पहचान गंभीर संकट में पड़ सकती है।

राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज
चंपई सोरेन के इस बयान के बाद झारखंड की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। धर्मांतरण, आरक्षण और आदिवासी पहचान का मुद्दा पहले से ही राज्य की राजनीति में संवेदनशील विषय माना जाता रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला केवल धार्मिक नहीं बल्कि संवैधानिक, सामाजिक और राजनीतिक बहस से भी जुड़ा हुआ है।

धर्मांतरण और ST आरक्षण को लेकर चंपई सोरेन का बयान आने वाले दिनों में झारखंड और राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है। आदिवासी पहचान, सांस्कृतिक संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों को लेकर छिड़ी यह बहस अब और तेज होती दिखाई दे रही है।

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