झारखंड में वेतन घोटाला: 14 कोषागारों में 31.47 करोड़ की गड़बड़ी, DSP समेत सैकड़ों कर्मचारी शामिल

Government Employees Fraud

महालेखाकार की रिपोर्ट से खुलासा, एक महीने में दो-दो बार वेतन निकासी का खेल

रांची : झारखंड में सरकारी खजाने से जुड़े एक बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और वित्तीय निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महालेखाकार (AG) की ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है कि राज्य के 33 में से 14 कोषागारों में भारी वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 200 से अधिक पुलिसकर्मियों और सरकारी कर्मचारियों ने सिस्टम की तकनीकी खामियों का फायदा उठाते हुए एक ही महीने में दो-दो बार वेतन और एरियर की निकासी की। इस पूरे फर्जीवाड़े से सरकारी खजाने को कुल 31.47 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जिसमें से केवल दोहरा वेतन भुगतान ही 7.67 करोड़ रुपये का है।

DSP स्तर के अधिकारी भी जांच के घेरे में
इस घोटाले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें कानून व्यवस्था संभालने वाले अधिकारी भी शामिल पाए गए हैं। रिपोर्ट में DSP स्तर के अधिकारियों— नौशाद आलम, राजेश यादव, मणिभूषण प्रसाद और मुकेश कुमार महतो—के नाम सामने आए हैं। इन अधिकारियों पर आरोप है कि इन्होंने अपनी अलग-अलग पदस्थापनाओं के दौरान नियमों को दरकिनार कर दोहरा वेतन और एरियर उठाया। इतना ही नहीं, इस घोटाले में बड़ी संख्या में सिपाही, सहायक शिक्षक और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी भी शामिल हैं, जिससे यह मामला और भी व्यापक हो गया है।

14 जिलों के कोषागारों में फैला घोटाले का नेटवर्क
महालेखाकार ने राज्य सरकार को भेजे पत्र में जिन 14 कोषागारों में गड़बड़ी की पुष्टि की है, उनमें शामिल हैं:

  • हजारीबाग
  • बोकारो
  • रांची
  • देवघर
  • पलामू
  • गोड्डा
  • जमशेदपुर
  • तेनुघाट
  • गुमला
  • चाईबासा
  • महेशपुर
  • खूंटी
  • सरायकेला
  • रामगढ़
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इन जिलों में फैले कोषागारों से फर्जी तरीके से वेतन निकासी की गई, जिससे यह साफ हो गया है कि यह कोई एक जगह तक सीमित मामला नहीं बल्कि राज्यव्यापी नेटवर्क के रूप में काम कर रहा था। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे खेल में कुल 614 कर्मचारियों की संलिप्तता सामने आई है।

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तकनीकी खामी का उठाया गया फायदा
जांच में यह बात सामने आई है कि कर्मचारियों ने सरकारी वेतन भुगतान प्रणाली की तकनीकी कमियों का फायदा उठाया। सिस्टम में मौजूद लूपहोल के कारण एक ही कर्मचारी को एक ही महीने में दो बार वेतन और एरियर जारी हो गया, जिसे जानबूझकर रोका नहीं गया। रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में कर्मचारियों ने इस गड़बड़ी को जानते हुए भी रकम वापस नहीं की और लगातार इस प्रक्रिया का लाभ उठाते रहे।

सिपाही से लेकर शिक्षक तक शामिल
जांच रिपोर्ट में जिन कर्मचारियों के नाम प्रमुखता से सामने आए हैं, उनमें सिपाही— बिरसा राकेश कुमार चौधरी, अशोक संजय, चंदन कुमार तिवारी, अरविंद यादव, शंकर राम और सुरेंद्र राम शामिल हैं। इन सभी पर आरोप है कि इन्होंने सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर दोहरा भुगतान प्राप्त किया। यह घोटाला केवल पुलिस विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा विभाग और अन्य सरकारी कार्यालयों तक फैला हुआ है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पूरे सिस्टम में व्यापक स्तर पर निगरानी की कमी रही है।

कड़ी कार्रवाई और वसूली की सिफारिश
महालेखाकार (AG) ने इस पूरे मामले को गंभीर वित्तीय अनियमितता मानते हुए राज्य सरकार को दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की सिफारिश की है। इसके साथ ही, गलत तरीके से निकाली गई राशि की पूरी वसूली सुनिश्चित करने को भी कहा गया है। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस रिपोर्ट पर कितनी तेजी से कार्रवाई करती है और क्या दोषियों पर कानूनी शिकंजा कसता है या नहीं।

झारखंड में सामने आया यह वेतन घोटाला केवल आर्थिक नुकसान का मामला नहीं है, बल्कि यह सरकारी सिस्टम में मौजूद खामियों और जवाबदेही की कमी को भी उजागर करता है। जब कानून के रखवाले और सरकारी कर्मचारी ही इस तरह के घोटाले में शामिल पाए जाएं, तो यह आम जनता के भरोसे को कमजोर करता है। अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार इस पूरे मामले की गहराई से जांच कर दोषियों को सजा दिलाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए मजबूत सिस्टम तैयार करे।

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