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हाउसवाइफ नहीं, नेशन बिल्डर हैं महिलाएं’— सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

Supreme Court housewife ruling

अदालत बोली- ‘होममेकर’ शब्द का हो इस्तेमाल, महिलाओं का अवैतनिक श्रम अर्थव्यवस्था की रीढ़

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं और गृहिणियों की भूमिका को लेकर एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि उन्हें केवल “हाउसवाइफ” कहकर नहीं देखा जा सकता। वे वास्तव में “होममेकर” और “नेशन बिल्डर” हैं, जिनका योगदान परिवार ही नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी सड़क दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु या स्थायी अक्षमता की स्थिति में उसके घरेलू योगदान को मुआवजे के निर्धारण का महत्वपूर्ण आधार माना जाएगा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने कहा कि घरेलू कामकाज और परिवार की देखभाल को आर्थिक मूल्य से अलग नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने गृहिणी की घरेलू सेवाओं का न्यूनतम मूल्य 30,000 रुपये प्रतिमाह निर्धारित करने की बात कही।

23 साल पुराने सड़क हादसे के मामले में आया फैसला
यह फैसला हरियाणा के एक सड़क दुर्घटना मामले में आया, जिसमें वर्ष 2001 में सिरसा से फतेहाबाद जाते समय एक महिला की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। महिला अपने पीछे पति और तीन बच्चों को छोड़ गई थी। परिवार ने पहले मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) में मुआवजे की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने महिला को सामान्य मजदूर मानते हुए करीब 2 लाख रुपये का मुआवजा दिया। बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने यह राशि बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये कर दी।

लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने गृहिणी के घरेलू योगदान, परिवार की देखभाल और उसके अवैतनिक श्रम को ध्यान में रखते हुए कुल मुआवजा बढ़ाकर 62.77 लाख रुपये कर दिया।

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“गृहिणी परिवार की धुरी होती है”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी गृहिणी को परिवार के कमाने वाले सदस्य पर निर्भर बताना गलत है। वास्तव में पूरा परिवार उसकी मेहनत और देखभाल पर निर्भर रहता है। अदालत ने कहा कि खाना बनाना, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, घर की सफाई और दैनिक प्रबंधन जैसे कार्य देश की अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से सहारा देते हैं। इन कार्यों की वजह से परिवार के अन्य सदस्य अपनी नौकरी और व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।

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‘हाउसवाइफ’ नहीं, ‘होममेकर’ कहें
सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्दों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि “हाउसवाइफ” शब्द महिलाओं की भूमिका को सीमित करता है, जबकि “होममेकर” उनके वास्तविक योगदान को बेहतर तरीके से दर्शाता है। पीठ ने कहा कि महिलाओं के बारे में बनी पारंपरिक धारणाओं को बदलने की जरूरत है और समाज को उनके योगदान का सम्मान करना चाहिए।

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अर्थव्यवस्था में 15-17 प्रतिशत तक योगदान
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने टाइम यूज सर्वे 2019 का हवाला दिया। रिपोर्ट के अनुसार 15 से 59 वर्ष की महिलाएं प्रतिदिन 7 घंटे से अधिक समय घरेलू कार्यों में लगाती हैं, जबकि पुरुष इन कामों में औसतन 3 घंटे से भी कम समय देते हैं। कोर्ट ने कहा कि महिलाओं का यह अवैतनिक घरेलू श्रम भारत की अर्थव्यवस्था में 15 से 17 प्रतिशत तक योगदान देता है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें न तो आर्थिक मान्यता मिलती है और न ही पर्याप्त सामाजिक सम्मान।

भविष्य के मामलों पर पड़ेगा असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। अब गृहिणियों के घरेलू योगदान का मूल्यांकन अधिक गंभीरता से किया जाएगा और मुआवजे की राशि तय करते समय उनके श्रम को भी उचित महत्व दिया जाएगा।

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