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झारखंड की पहचान को मिला वैश्विक सम्मान, 11 पारंपरिक उत्पादों को मिला GI टैग

Jharkhand GI Tag

सिल्क से लेकर बांस शिल्प तक, अब दुनिया में अलग पहचान बनाएंगे झारखंड के उत्पाद

रांची: झारखंड की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्पकला और स्थानीय उत्पादों को एक बड़ी राष्ट्रीय उपलब्धि हासिल हुई है। राज्य के 11 विशिष्ट उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) टैग प्रदान किया गया है। यह उपलब्धि न केवल झारखंड की पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत करेगी, बल्कि हजारों कारीगरों, बुनकरों और ग्रामीण उत्पादकों की आजीविका के लिए भी नए अवसर खोलेगी। इस वर्ष GI टैग प्राप्त करने वाले प्रमुख उत्पादों में कोडरमा का केसरिया कलाकंद, कुचाई सिल्क, भगैया सिल्क, मुंडा ज्वेलरी और झारखंड बांस शिल्प शामिल हैं। इससे पहले वर्ष 2021 में झारखंड की प्रसिद्ध सोहराय-कोहबर पेंटिंग को भी GI टैग मिल चुका है।

क्या होता है GI टैग और क्यों है यह महत्वपूर्ण?
GI टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक विशिष्टता और उसकी प्रामाणिकता का आधिकारिक प्रमाण होता है। यह सुनिश्चित करता है कि उस उत्पाद की गुणवत्ता, विशेषता और प्रतिष्ठा किसी खास क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इससे उत्पादों की नकल रोकने में मदद मिलती है और बाजार में उन्हें बेहतर मूल्य मिलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने के बाद झारखंड के उत्पादों को देश-विदेश के बाजारों में नई पहचान मिलेगी। साथ ही इनके निर्यात और ब्रांडिंग की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।

नाबार्ड की भूमिका रही अहम
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने चार महत्वपूर्ण उत्पादों—भगैया सिल्क, कुचाई सिल्क, मुंडा ज्वेलरी और झारखंड बांस शिल्प—को GI टैग दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नाबार्ड ने इन उत्पादों की विशिष्टताओं का दस्तावेजीकरण, उत्पादकों का संगठन, मूल्य श्रृंखला का विकास और GI पंजीकरण प्रक्रिया में तकनीकी सहयोग प्रदान किया। वर्षों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है कि आज ये उत्पाद राष्ट्रीय पहचान हासिल कर सके हैं।

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रेशम उद्योग को मिलेगा नया विस्तार
भगैया सिल्क और कुचाई सिल्क को GI टैग मिलने से झारखंड की पारंपरिक रेशम उद्योग को नई ऊर्जा मिलेगी। स्थानीय तकनीकों और पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल के आधार पर तैयार होने वाले ये उत्पाद अब वैश्विक बाजारों तक पहुंच बना सकेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे रेशम उत्पादन से जुड़े हजारों परिवारों की आय में वृद्धि होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।

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जनजातीय संस्कृति का प्रतीक बनी मुंडा ज्वेलरी
मुंडा ज्वेलरी को GI टैग मिलना झारखंड की आदिवासी संस्कृति के लिए गर्व का विषय माना जा रहा है। अपनी विशिष्ट डिजाइन और सांस्कृतिक महत्व के कारण यह आभूषण मुंडा समुदाय की पहचान का हिस्सा रहा है। इस मान्यता से आदिवासी कारीगरों को राष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा और उनकी पारंपरिक कला को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।

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बांस शिल्प को मिलेगा बड़ा बाजार
झारखंड के बांस शिल्प को भी GI टैग मिलने से ग्रामीण कारीगरों के लिए नई संभावनाएं खुलेंगी। स्थानीय स्तर पर तैयार किए जाने वाले बांस उत्पाद अब व्यापक बाजारों तक पहुंच सकेंगे। इससे न केवल कारीगरों की आय बढ़ेगी बल्कि बांस आधारित उद्यमिता को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

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ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा लाभ
नाबार्ड झारखंड की मुख्य महाप्रबंधक दीपमाला घोष ने कहा कि यह उपलब्धि झारखंड की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, शिल्प कौशल और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है। उन्होंने कहा कि GI टैग केवल पहचान ही नहीं देता, बल्कि उत्पादों को आर्थिक मूल्य भी प्रदान करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से इन उत्पादों की ब्रांडिंग मजबूत होगी, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और आर्थिक लाभ सीधे उन समुदायों तक पहुंचेगा जिन्होंने पीढ़ियों से इन परंपराओं को जीवित रखा है।

झारखंड के लिए क्यों है यह ऐतिहासिक उपलब्धि?
झारखंड लंबे समय से अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, हस्तशिल्प और प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता रहा है। GI टैग मिलने के बाद राज्य के पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक पहचान मिलने की राह और आसान हो जाएगी। यह कदम न केवल सांस्कृतिक संरक्षण बल्कि ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

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