MMDR Bill पर हेमंत सोरेन का राहुल गांधी को पत्र, बोले- झारखंड के अधिकार और खनिज राजस्व पर बड़ा संकट















रांची: झारखंड की खनिज संपदा और राज्य के राजस्व अधिकार को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव अब और तेज होता दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 13 अगस्त 2026 को कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पत्र लिखकर Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 पर हस्तक्षेप और समर्थन की अपील की है। संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुके इस विधेयक को लेकर झारखंड सरकार का तर्क है कि इसके प्रावधान राज्यों की खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, सेस या लेवी लगाने की शक्ति को सीमित कर सकते हैं। संसद ने विधेयक को 13 अगस्त को मंजूरी दी है।अब हेमंत सोरेन ने इस मुद्दे को राज्यों के अधिकार, सहकारी संघवाद और झारखंड की आर्थिक हिस्सेदारी से जोड़ते हुए विपक्ष से समर्थन मांगा है।
हेमंत सोरेन ने राहुल गांधी से क्यों मांगा हस्तक्षेप?
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में प्रस्तावित धारा 9D को लेकर विशेष चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस प्रावधान से खनिज अधिकारों अथवा खनिज-युक्त भूमि पर राज्यों की ओर से लगाए जाने वाले टैक्स, सेस और अन्य शुल्क केंद्र द्वारा तय शर्तों और सीमाओं के अधीन हो सकते हैं।सोरेन का कहना है कि इससे झारखंड जैसे खनिज संपदा वाले राज्यों के वित्तीय अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। मुख्यमंत्री इससे पहले प्रधानमंत्री के सामने भी राज्य की आपत्तियां रख चुके हैं। अब संसद से विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने राहुल गांधी से इस मुद्दे को संसद और अन्य उपयुक्त मंचों पर उठाने की अपील की है।
















झारखंड के लिए खनिज राजस्व क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
झारखंड की अर्थव्यवस्था में खनिज क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि 2024-25 में खनन से संबंधित प्राप्तियां झारखंड के अपने गैर-कर राजस्व का करीब 84.9 प्रतिशत थीं। यानी खनिज सिर्फ झारखंड की पहचान नहीं हैं… राज्य की वित्तीय व्यवस्था का भी बड़ा आधार हैं। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, चूना पत्थर और अन्य खनिजों से झारखंड लंबे समय से देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को संसाधन उपलब्ध कराता रहा है। लेकिन मुख्यमंत्री का तर्क है कि खनन से होने वाले आर्थिक लाभ की कीमत झारखंड के स्थानीय लोगों और आदिवासी समुदायों ने भी चुकाई है—विस्थापन, पर्यावरणीय नुकसान, पारंपरिक आजीविका पर असर और जंगल-जमीन-पानी पर बढ़ते दबाव के रूप में।






2024 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का भी दिया हवाला
हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Ltd. मामले में 25 जुलाई 2024 के फैसले का उल्लेख किया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में राज्यों की खनिज-युक्त भूमि पर कराधान से जुड़ी संवैधानिक शक्ति को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था की गई थी। इसी संवैधानिक बहस के बाद झारखंड ने Jharkhand Mineral Bearing Land Cess Act, 2024 लागू किया था। अब राज्य सरकार का कहना है कि MMDR में प्रस्तावित बदलाव उस संवैधानिक स्थिति और राज्यों के अधिकारों पर असर डाल सकता है।
झारखंड को राजस्व का कितना नुकसान?
झारखंड सरकार की सबसे बड़ी चिंता संभावित राजस्व नुकसान को लेकर है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक राज्य सरकार का अनुमान है कि प्रस्तावित व्यवस्था से खनिज-आधारित सेस से होने वाली बड़ी आय प्रभावित हो सकती है। यही पैसा राज्य सरकार सामाजिक सुरक्षा, कल्याणकारी योजनाओं और खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास में इस्तेमाल करने की उम्मीद कर रही थी। इसलिए सोरेन सरकार इसे सिर्फ टैक्स का मुद्दा नहीं, बल्कि झारखंड के वित्तीय अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाले लाभ के बंटवारे का सवाल बता रही है।
केंद्र का तर्क क्या है?
दूसरी तरफ केंद्र सरकार का तर्क है कि राज्यों द्वारा अलग-अलग अतिरिक्त कर और सेस लगाए जाने से खनन क्षेत्र पर वित्तीय बोझ बढ़ता है। इससे खनन परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता और निवेश प्रभावित हो सकता है। केंद्र का उद्देश्य खनिज क्षेत्र में एकरूपता, स्पष्टता और स्थिरता लाना बताया जा रहा है। यानी एक तरफ केंद्र इसे खनन क्षेत्र में सुधार और समान व्यवस्था की दिशा में कदम बता रहा है, तो दूसरी तरफ झारखंड इसे राज्यों के वित्तीय अधिकारों पर संभावित अंकुश मान रहा है।
अब लड़ाई सिर्फ झारखंड बनाम केंद्र नहीं?
इस मुद्दे ने अब संघीय ढांचे की बहस को भी हवा दे दी है। झारखंड के अलावा केरल ने भी प्रस्तावित बदलावों पर आपत्ति जताई है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या खनिज संपदा वाले राज्य मिलकर केंद्र के सामने अपनी साझा आपत्ति रखेंगे? हेमंत सोरेन ने राहुल गांधी से इसी दिशा में सामूहिक प्रयास की अपील की है।
सोरेन का बड़ा राजनीतिक संदेश
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में इस मुद्दे को सामाजिक न्याय, आदिवासी अधिकार, संवैधानिक मूल्यों और सहकारी संघवाद से जोड़ दिया है। उनका तर्क है कि जिन राज्यों से देश को खनिज मिलते हैं, वहां के लोगों और क्षेत्रों को उन प्राकृतिक संसाधनों से होने वाले आर्थिक लाभ में उचित हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। अब नजर इस बात पर है कि राहुल गांधी और विपक्ष इस मुद्दे को संसद और राजनीतिक मंचों पर कितना जोरदार तरीके से उठाते हैं। क्योंकि झारखंड के लिए सवाल सिर्फ एक बिल का नहीं है…सवाल है—झारखंड की धरती से निकलने वाले खनिजों पर अधिकार किसका और उससे मिलने वाले राजस्व पर फैसला कौन करेगा?और आने वाले दिनों में यही मुद्दा केंद्र बनाम राज्य के अधिकारों की बड़ी राजनीतिक लड़ाई का रूप ले सकता है।






