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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कंटेम्प्ट की मांग, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

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अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल से आपराधिक अवमानना की अनुमति मांगी

ECI के भीतर 14 आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद बढ़ा विवाद

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विवाद अब कानूनी मोर्चे तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति मांगी है। ब्रजेश सिंह ने अपने पत्र में Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 15(1)(b) और धारा 2(c) का हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट में किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की लिखित सहमति की आवश्यकता होती है। इस स्तर पर यह केवल कार्यवाही शुरू करने की अनुमति मांगने का कदम है; इसे CEC के खिलाफ अवमानना साबित होने या सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोई निष्कर्ष दिए जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता।

किन सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया गया हवाला?
ब्रजेश सिंह ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के चुनाव आयोग से जुड़े पुराने फैसलों का उल्लेख किया है, जिनमें T.N. Seshan बनाम Union of India और Anoop Baranwal बनाम Union of India प्रमुख हैं। उनका आरोप है कि मौजूदा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली इन फैसलों में निर्धारित संवैधानिक व्यवस्था और संस्थागत भूमिका के अनुरूप नहीं है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। 1995 के T.N. Seshan फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। फैसले में कहा गया कि चुनाव आयोग एक संस्था है और जब आयोग बहुसदस्यीय होता है तो अन्य चुनाव आयुक्त भी निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि CEC को इस अर्थ में सर्वोच्च माना जाए कि उसका शब्द ही अंतिम हो, तो अन्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका निष्प्रभावी हो जाएगी। दूसरी ओर, Anoop Baranwal मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक आवश्यकता पर विचार किया था। इसलिए दोनों फैसलों को एक ही कानूनी सिद्धांत का फैसला बताना सही नहीं होगा।

ब्रजेश सिंह का क्या आरोप है?
अधिवक्ता ब्रजेश सिंह का आरोप है कि CEC ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग के कामकाज में ऐसी प्रक्रिया अपनाई गई जिसमें अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना फैसले लिए या आदेश जारी किए गए। उनका दावा है कि इससे बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था के सामूहिक कामकाज पर सवाल उठता है। पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि ऐसी कार्यप्रणाली सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून की अवहेलना के दायरे में आ सकती है। हालांकि ये अधिवक्ता द्वारा लगाए गए आरोप हैं, न कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित तथ्य या कोई न्यायिक निष्कर्ष।

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चुनाव आयोग के अंदर 14 आपत्तियों की रिपोर्ट
यह मामला उस समय सामने आया है जब The Indian Express ने 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक इन आपत्तियों का संबंध मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम जोड़ने और हटाने, Form-6 में बदलाव, चुनावी डेटा और Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़े फैसलों से था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों और आदेशों को अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना जारी किए जाने पर सवाल उठाए।

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किन मुद्दों पर उठी आपत्ति?
रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों में मुख्य रूप से ये मुद्दे शामिल रहे—

  • नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव
  • Form-6 से संबंधित बदलाव
  • मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया
  • SIR के दौरान मतदाता सूची से जुड़े फैसले
  • चुनावी डेटा और सॉफ्टवेयर तक पहुंच
  • चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकरण से जुड़ी चिंताएं
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The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ कदमों को “unauthorised” और “illegal” बताते हुए आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ आपत्तियां एक ही दिन में दर्ज की गई थीं।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?
इन रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग की ओर से अलग तस्वीर पेश की गई है। आयोग के अधिकारियों ने कहा है कि आयोग के फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए जाते हैं और SIR समेत महत्वपूर्ण फैसलों पर तीनों की सहमति रही है। चुनाव आयोग ने रिपोर्ट में सामने आए मतभेदों को गंभीर संस्थागत टकराव के रूप में स्वीकार करने के बजाय इसे आयोग के भीतर होने वाली लोकतांत्रिक चर्चा और विचार-विमर्श का हिस्सा बताया है। यानी फिलहाल दो अलग-अलग दावे सामने हैं—एक तरफ दो चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट है, जबकि दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

अब आगे क्या होगा?
ब्रजेश सिंह के पत्र पर अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी की प्रतिक्रिया इस मामले में अगला महत्वपूर्ण कानूनी चरण होगी। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि AG आपराधिक अवमानना की कार्यवाही के लिए सहमति देते हैं या नहीं। यदि सहमति दी जाती है, तो उसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ाने का रास्ता खुलेगा। इसलिए अभी इसे CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शुरू हुई अवमानना कार्रवाई कहना जल्दबाजी होगी। इस पूरे विवाद का केंद्र अब तीन सवालों पर है—बहुसदस्यीय चुनाव आयोग में निर्णय लेने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है, चुनाव आयुक्तों की असहमति का संस्थागत प्रभाव क्या है और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की व्याख्या मौजूदा विवाद पर किस हद तक लागू होती है। फिलहाल इन सवालों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

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