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CMPFO के 1390 करोड़ निवेश में बड़ा सवाल, DHFL से 727 करोड़ का नुकसान; CBI ने दर्ज की FIR

CMPFO के DHFL निवेश मामले में CBI जांच और 727 करोड़ रुपये के नुकसान का मामला

2015 से 2018 के बीच DHFL में हुआ था 1,390 करोड़ का निवेश, छह महीने तक लंबित रहा रकम निकालने का प्रस्ताव

रांची: धनबाद स्थित कोल माइंस प्रोविडेंट फंड संगठन (CMPFO) के करीब 1,390 करोड़ रुपये के निवेश में कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला अब सीबीआई जांच के दायरे में आ गया है। दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (DHFL) में किए गए निवेश के कारण CMPFO को करीब 727.67 करोड़ रुपये के नुकसान का मामला सामने आया है। झारखंड हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई की एंटी करप्शन ब्रांच, रांची ने मामले में नियमित प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। FIR में CMPFO के तत्कालीन कमिश्नर अनिमेष भारती, DHFL के तत्कालीन प्रमोटर एवं निदेशक कपिल वाधवान और धीरज वाधवान के अलावा संगठन के अज्ञात अधिकारियों और अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है।

2015 से 2018 के बीच DHFL में हुआ था 1,390 करोड़ का निवेश
CBI की प्राथमिकी के अनुसार, CMPFO ने वर्ष 2015 से 2018 के बीच DHFL में लगभग 1,390.25 करोड़ रुपये का निवेश किया था। निवेश के दौरान वित्तीय विशेषज्ञों और फंड मैनेजरों की ओर से कथित तौर पर DHFL की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता जताई गई थी। बताया गया कि विशेषज्ञों ने निवेश की रकम को समय रहते वापस निकालने की सलाह दी थी। इसके बावजूद CMPFO के स्तर पर इस सलाह पर तत्काल कार्रवाई नहीं की गई।

छह महीने तक लंबित रहा रकम निकालने का प्रस्ताव
FIR के मुताबिक, DHFL से निवेश की रकम वापस निकालने का प्रस्ताव करीब छह महीने तक लंबित रहा। आखिरकार 20 दिसंबर 2019 को रकम निकालने का प्रस्ताव पारित किया गया। लेकिन तब तक DHFL दिवालिया समाधान प्रक्रिया यानी रिजॉल्यूशन प्रक्रिया में जा चुकी थी। इसके बाद CMPFO को निवेश की रकम में करीब 727.67 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। यही बिंदु अब सीबीआई जांच का प्रमुख हिस्सा है कि जब निवेश से जुड़े जोखिम को लेकर पहले ही चेतावनी दी गई थी, तो रकम वापस लेने की कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई।

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हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को CBI जांच का दिया आदेश
मामले को लेकर झारखंड हाईकोर्ट में W.P. (PIL) No. 4486/2022 के तहत जनहित याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि सार्वजनिक भविष्य निधि की इतनी बड़ी रकम के नुकसान के बावजूद संबंधित अधिकारियों की भूमिका की पर्याप्त जांच नहीं हुई और जिम्मेदार लोगों को बचाने का प्रयास किया गया। झारखंड हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को मामले की गंभीरता को देखते हुए CBI जांच का आदेश दिया। अदालत ने मामले को सामान्य वित्तीय नुकसान तक सीमित नहीं माना। आदेश में इस बात पर जोर दिया गया कि करीब 727.67 करोड़ रुपये सार्वजनिक धन के नुकसान से जुड़ा मामला है और इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है, ताकि जांच की निष्पक्षता को लेकर जनता का विश्वास बना रहे।

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विभागीय जांच और आपराधिक जांच को अलग माना
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय कार्रवाई और आपराधिक जांच की प्रकृति अलग होती है। अदालत के अनुसार, केवल विभागीय जांच इस मामले के आपराधिक पहलुओं की जांच के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। इसी आधार पर अदालत ने मामले की आपराधिक पहलुओं से स्वतंत्र जांच की जरूरत बताई और CBI को जांच का जिम्मा सौंपा।

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CMPFO अधिकारियों की भूमिका पर भी उठे सवाल
हाईकोर्ट ने CMPFO के अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि जब वित्तीय विशेषज्ञों की ओर से निवेश वापस लेने की सलाह दी गई थी, तो अधिकारियों ने उस पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। अदालत ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि इतनी बड़ी रकम के नुकसान को केवल व्यावसायिक नुकसान के तौर पर देखने की कोशिश की गई। उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसे तथ्य पाए जाने की बात सामने आई, जिनके आधार पर आपराधिक पहलू की जांच जरूरी मानी गई।

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क्लीन चिट को जांच का आधार नहीं बनाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने तत्कालीन क्षेत्रीय आयुक्त पंकज कुमार की ओर से दाखिल हलफनामे पर भी सवाल उठाए। बताया गया कि हलफनामे में मामले को केवल व्यावसायिक नुकसान बताते हुए आपराधिक साजिश या विश्वासघात की संभावना से इनकार किया गया था। अदालत ने निर्देश दिया कि इस तरह दी गई कथित क्लीन चिट को CBI जांच का आधार नहीं बनाया जाए। अब CBI की जांच में यह स्पष्ट किया जाना है कि DHFL में निवेश का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया, जोखिम संबंधी चेतावनियों के बावजूद रकम निकालने में देरी क्यों हुई और इस पूरे घटनाक्रम में संबंधित अधिकारियों तथा अन्य आरोपियों की क्या भूमिका रही। फिलहाल FIR में लगाए गए आरोप जांच के अधीन हैं। आरोपियों की भूमिका और किसी आपराधिक साजिश की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

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