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2 से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने की पाबंदी? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कानूनों की प्रासंगिकता खत्म

दो बच्चे होने पर चुनाव लड़ने की पाबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

2003 में TFR 3, अब घटकर 1.9, कोर्ट ने कहा- बदलते हालात में कानूनों की समीक्षा जरूरी

नई दिल्ली: भारत में घटती प्रजनन दर के बीच सुप्रीम कोर्ट ने दो से अधिक बच्चे होने पर स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानूनों को लेकर बुधवार को अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंड या अयोग्यता लगाने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब खत्म हो चुकी है। अदालत ने इस मुद्दे से जुड़े पुराने फैसले पर दोबारा विचार की जरूरत बताते हुए मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि देशभर में दो से अधिक बच्चे वाले लोगों पर चुनाव लड़ने की पाबंदी तत्काल खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर ऐसे स्थानीय निकाय चुनाव संबंधी कानूनों की संवैधानिकता और प्रासंगिकता पर पुनर्विचार का रास्ता खोला है।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला महाराष्ट्र की काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता से जुड़ा है। महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत तीसरे बच्चे के जन्म के बाद उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने उनकी अयोग्यता को रद्द कर दिया। साथ ही अदालत ने दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को स्थानीय निकाय चुनावों से बाहर करने वाले कानूनों के व्यापक सवाल पर विचार किया।

2003 के ‘जावेद बनाम हरियाणा’ फैसले पर फिर विचार
सुप्रीम कोर्ट ने ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ (2003) में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत जताई है। उस मामले में तीन जजों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को संवैधानिक रूप से वैध माना था, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाता था। अब मौजूदा पीठ ने इस पुराने फैसले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है। इसका मतलब है कि भविष्य में बड़ी पीठ इस बात पर विचार कर सकती है कि बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में दो-बच्चे की सीमा से जुड़े ऐसे कानून संवैधानिक रूप से कायम रह सकते हैं या नहीं।

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2003 में TFR 3, अब घटकर 1.9
सुप्रीम कोर्ट ने भारत में बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति को अपने विचार का महत्वपूर्ण आधार बनाया। अदालत ने कहा कि 2003 में भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) करीब 3 थी, जो अब घटकर 1.9 हो गई है। कोर्ट ने यह भी कहा कि 2.1 का TFR प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) माना जाता है। मौजूदा दर इसके नीचे पहुंच चुकी है। अदालत के अनुसार, अगर यह स्थिति जारी रहती है तो आने वाले समय में देश को वृद्ध होती आबादी और कार्यशील उम्र की आबादी के घटते हिस्से जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

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कोर्ट ने कहा- बदलते हालात में कानूनों की समीक्षा जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन कानूनों का आधार बढ़ती आबादी और जनसंख्या नियंत्रण की चिंता थी, उनकी समीक्षा बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी चिंता जताई कि ऐसे कानून नागरिकों के एक वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर कर सकते हैं, जबकि दो से अधिक बच्चे होना किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से सीधे तौर पर जुड़ा नहीं है। कोर्ट ने इसे प्रजनन स्वायत्तता से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में भी देखा।

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अभी क्या बदला है?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह कहना सही नहीं होगा कि “दो से ज्यादा बच्चे होने पर अब कोई भी चुनाव नहीं लड़ सकता या पाबंदी पूरी तरह खत्म हो गई।”फिलहाल अदालत ने एक विशेष मामले में अयोग्यता रद्द की है और दो-बच्चे की सीमा वाले कानूनों से जुड़े संवैधानिक सवाल को बड़ी पीठ के विचार के लिए भेजा है। अलग-अलग राज्यों में ऐसे नियमों की स्थिति भी एक जैसी नहीं है। इसलिए अंतिम स्थिति बड़ी पीठ के फैसले और संबंधित राज्य कानूनों पर निर्भर करेगी।

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