सूर्या हांसदा एनकाउंटर पर बवाल: बाबूलाल मरांडी ने मांगी हाईकोर्ट जज से जांच, बोले– ‘आदिवासी आवाज़ को कुचला गया’

रांची: झारखंड में आदिवासी समाज के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले युवा नेता सूर्या हांसदा के कथित संदेहास्पद एनकाउंटर को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। नेता प्रतिपक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूलाल मरांडी ने इस घटना को लेकर राज्य सरकार पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह एनकाउंटर न्याय नहीं, बल्कि सत्ता की क्रूर ताकत का प्रदर्शन है, जिसके जरिए एक निर्भीक आदिवासी आवाज़ को सदा के लिए खामोश कर दिया गया।

हाईकोर्ट के सिटिंग जज से जांच की मांग
बाबूलाल मरांडी ने सरकार से स्पष्ट मांग की है कि इस पूरे मामले की जांच झारखंड हाईकोर्ट के सिटिंग जज की अध्यक्षता में होनी चाहिए। उनका कहना है कि जब तक जांच एक स्वतंत्र और सर्वोच्च न्यायिक निगरानी में नहीं होगी, तब तक आदिवासी समाज को न्याय मिलने की कोई संभावना नहीं है। मरांडी ने सोशल मीडिया पर सूर्या हांसदा के भाषण का एक वीडियो भी साझा किया है, जिसमें वे आदिवासी समाज के शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के मुद्दे पर जोश से बोलते दिखाई दे रहे हैं। बाबूलाल ने कहा, “सूर्या आदिवासी बेटियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कर रहे थे। वे बार-बार कहते थे कि उनकी गरिमा की रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है।”
‘आदिवासी जमीन की लूट के खिलाफ खड़े थे सूर्या’
नेता प्रतिपक्ष ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सूर्या हांसदा, संथाल परगना में चल रही आदिवासी जमीन की लूट, विस्थापन और शोषण के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। वे स्थानीय लोगों के अधिकार, संसाधनों और पहचान की रक्षा के लिए लगातार आवाज़ उठा रहे थे। मरांडी ने आरोप लगाया कि ऐसी आवाज़ें सरकार को हमेशा खटकती हैं और यही कारण है कि उन्हें योजनाबद्ध तरीके से रास्ते से हटा दिया गया।
- उन्होंने कहा, “एक निर्भीक युवा, जो आदिवासी समाज के बीच उम्मीद की किरण था, उसे पुलिस ने संदिग्ध मुठभेड़ में मार गिराया। यह न केवल न्याय की हत्या है, बल्कि लोकतंत्र और संविधान पर सीधा हमला है।”
‘यह सिर्फ सूर्या की हत्या नहीं, यह आंदोलन को दबाने की साजिश है’
मरांडी ने कहा कि सूर्या की हत्या आदिवासी समाज में डर फैलाने की एक सुनियोजित कोशिश है। यह संदेश देने का प्रयास है कि अगर कोई भी शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाएगा, तो उसका हश्र भी ऐसा ही होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यह घटना आदिवासी समाज के बीच एक बड़े आंदोलन की चिंगारी बनेगी।
- “सूर्या की आवाज़ संथाल परगना में उत्पीड़न झेल रहे आदिवासी समाज की पुकार थी। अब यही आवाज़ एक व्यापक जनांदोलन का रूप लेगी। हम इस मामले को न्यायालय से लेकर सड़क तक लड़ेंगे,” मरांडी ने ऐलान किया।


पुलिस की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों और आदिवासी संगठनों का आरोप है कि सूर्या को पहले से निशाना बनाया गया और मुठभेड़ का पूरा घटनाक्रम संदिग्ध है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पुलिस ने सूर्या को जिंदा पकड़ने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या उनके पास वास्तव में हथियार थे, या यह मुठभेड़ केवल फर्जी कहानी गढ़कर की गई?

मरांडी ने कहा कि जब तक निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक इस घटना की सच्चाई सामने नहीं आएगी और पुलिस के दावों पर भरोसा करना मुश्किल है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार और पुलिस मिलकर सच छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।


आदिवासी समाज में गुस्सा और आक्रोश
सूर्या हांसदा की मौत ने आदिवासी इलाकों में गुस्से की लहर पैदा कर दी है। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और सोशल मीडिया पर #JusticeForSuryaHansda ट्रेंड कर रहा है। युवाओं का कहना है कि सूर्या जैसे नेताओं की कमी को कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा।
आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह घटना आदिवासी अस्मिता पर हमला है और इसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वे भी बाबूलाल मरांडी की मांग का समर्थन करते हुए हाईकोर्ट की निगरानी में जांच की मांग कर रहे हैं।
राजनीतिक हलचल तेज
यह मामला अब पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। भाजपा और अन्य विपक्षी दल इसे राज्य सरकार की विफलता और दमनकारी नीति का उदाहरण बता रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष ने अभी तक इस मामले पर कोई ठोस बयान नहीं दिया है। हालांकि, सरकार के करीबी सूत्रों का कहना है कि वे पुलिस की कार्रवाई का बचाव करने की तैयारी में हैं और इसे “कानून-व्यवस्था की मजबूरी” बताकर पेश करेंगे।
लेकिन आदिवासी समाज और विपक्ष इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं है। बाबूलाल मरांडी ने साफ कहा है कि अगर सरकार ने जांच से बचने की कोशिश की, तो वे पूरे राज्य में आंदोलन छेड़ देंगे।