243 सीटें, 17% आबादी… फिर भी NDA ने उतारे सिर्फ 4 मुस्लिम उम्मीदवार!

NDA Bihar

बिहार चुनाव अपडेट : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए एनडीए ने अपने सभी उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। लेकिन इस बार की लिस्ट में सबसे ज्यादा चर्चा उस आंकड़े को लेकर हो रही है, जो बिहार की राजनीति में बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है — 243 सीटों वाले बिहार में 17% मुस्लिम आबादी के बावजूद एनडीए ने सिर्फ 4 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है।

यह आंकड़ा केवल सांख्यिकीय नहीं, बल्कि सियासी संकेतों से भरा हुआ है। क्योंकि 2020 के विधानसभा चुनाव में भी जेडीयू ने 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें से सभी हार गए थे। इस बार पार्टी ने अपने मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या घटाकर 4 कर दी है।

NDA की सीटों की घोषणा पूरी, लेकिन मुस्लिम प्रतिनिधित्व घटा
एनडीए के सभी घटक दलों — भाजपा, जेडीयू, हम (HAM), लोजपा (राम विलास) और आरएलएम — ने अपने हिस्से की सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। जेडीयू ने बुधवार को अपनी पहली सूची जारी करते हुए 57 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए थे, वहीं गुरुवार को दूसरी सूची में शेष नामों की घोषणा की गई। भाजपा ने तीन चरणों में अपने 101 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की, जबकि हम पार्टी ने 6, लोजपा (रामविलास) ने 14 और आरएलएम ने अपने हिस्से की सीटों पर उम्मीदवार तय कर दिए हैं।

इन सभी घोषणाओं के बीच जेडीयू अकेली ऐसी पार्टी रही जिसने मुस्लिम समाज को टिकट दिया — सिर्फ 4 उम्मीदवारों को। बाकी घटक दलों, यानी भाजपा, हम, लोजपा(रा), और आरएलएम में एक भी मुस्लिम नाम नहीं है।

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2020 की हार का असर या राजनीतिक रणनीति?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह निर्णय पूरी तरह “रियलिस्टिक पोलिटिकल कैल्कुलेशन” पर आधारित है। 2020 के चुनाव में जेडीयू के सभी मुस्लिम उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी के अंदर इस बार ऐसे विश्लेषण हुए कि मुस्लिम वोट अब बड़े पैमाने पर महागठबंधन, विशेष रूप से आरजेडी के पाले में जा चुके हैं।

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ऐसे में जेडीयू और भाजपा ने ‘सेफ सीट्स’ पर जातीय समीकरण और स्थानीय प्रभावशाली उम्मीदवारों को तरजीह दी है। लेकिन इस रणनीति ने एनडीए पर यह आरोप भी लगा दिया है कि वह अल्पसंख्यक वर्ग को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल रही है।

जातीय समीकरण का गणित और नीतीश की सावधानी
बिहार की राजनीति सदियों से जातीय संतुलन पर टिकी रही है। लालू यादव ने 90 के दशक में मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण बनाकर सत्ता की राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाई थी। नीतीश कुमार ने 2005 के बाद से इस समीकरण को तोड़ने के लिए सभी जातियों को समान प्रतिनिधित्व देने की नीति अपनाई।

हालांकि इस बार उन्होंने टिकट वितरण में बेहद सावधानी बरती है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि नीतीश कुमार जानते हैं कि उनका मुख्य वोट बैंक महादलित, अति पिछड़ा और महिला वर्ग है। इसलिए टिकट वितरण में उन्हीं समुदायों को प्राथमिकता दी गई है जो पिछले कुछ वर्षों में उनके स्थायी समर्थक बन गए हैं।

NDA की मुस्लिम पहुँच सीमित, JDU बनी ‘लाज बचाने वाली’ पार्टी
एनडीए में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का पूरा भार जेडीयू के कंधों पर ही है। भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषकों ने टिप्पणी की है कि “जेडीयू ने केवल एनडीए की सेकुलर लाज बचाने का काम किया है।”

नीतीश कुमार भले ही लंबे समय से “समावेशी विकास” और “सर्व धर्म सद्भाव” की राजनीति की बात करते रहे हों, लेकिन इस बार मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में भारी गिरावट ने इस छवि पर भी सवाल उठाए हैं।

महागठबंधन की नज़र मुस्लिम वोट बैंक पर
दूसरी तरफ महागठबंधन (RJD, कांग्रेस, वाम दल) अभी उम्मीदवारों की घोषणा में पीछे है, लेकिन माना जा रहा है कि वह अपने पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए 30 से अधिक मुस्लिम उम्मीदवार उतार सकता है।
2020 के चुनाव में आरजेडी ने 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 7 जीतने में सफल रहे। यही कारण है कि इस बार भी महागठबंधन मुस्लिम समाज को प्रतिनिधित्व देकर एनडीए के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करेगा।

सियासी संदेश साफ — ध्रुवीकरण की ओर बढ़ता बिहार चुनाव
बिहार चुनाव 2025 में उम्मीदवारों के चयन से यह साफ झलकता है कि एनडीए अब जातीय समीकरण और हिंदू एकजुटता पर फोकस कर रहा है, जबकि महागठबंधन अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों के गठजोड़ पर।
यह ध्रुवीकरण की राजनीति आने वाले चुनावी प्रचार में और तेज़ हो सकती है।

17% मुस्लिम आबादी वाले बिहार में एनडीए का मात्र 4 मुस्लिम उम्मीदवार उतारना राजनीतिक संकेतों से भरपूर है। यह न केवल सियासी प्राथमिकताओं में बदलाव दिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि बिहार की राजनीति अब “वोट बैंक से ज़्यादा सीट बैंक” पर केंद्रित हो गई है।

आने वाले चुनाव नतीजे तय करेंगे कि क्या एनडीए की यह रणनीति कारगर साबित होती है या मुस्लिम मतदाता एक बार फिर निर्णायक भूमिका निभाते हुए सत्ता समीकरण को बदल देंगे।

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