रांची में बेलगाम अपराध: क्या राजधानी में जंगलराज कायम हो गया है?

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राजधानी में एक के बाद एक जघन्य वारदात

Ranchi : राजधानी रांची में जिस तरह से एक के बाद एक जघन्य आपराधिक घटनाएं सामने आ रही हैं, उसने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि अपराधियों को न कानून का डर दिख रहा है और न ही पुलिस-प्रशासन का। आम लोगों के मन में यह सवाल अब तेज़ी से उठने लगा है कि आखिर रांची में चल क्या रहा है।

अपराधियों का हौसला किसके सहारे?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किसके दम पर अपराधियों का मनोबल इतना बढ़ गया है। क्या उन्हें यह भरोसा हो चला है कि वे अपराध कर बच निकलेंगे? या फिर कानून का डर राजधानी से खत्म होता जा रहा है? बीते कुछ दिनों की घटनाएं इस चिंता को और गहरा कर रही हैं।

बीते दिनों की घटनाएं डराने वाली
महज दो दिन पहले लालपुर इलाके में एक युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इससे पहले 31 दिसंबर की रात बिरसा चौक पर एक युवक को गाड़ी से कुचलकर मार दिया गया। ये घटनाएं अपने आप में बता रही हैं कि अपराधी कितने बेखौफ हो चुके हैं।

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अब मीडियाकर्मी भी सुरक्षित नहीं
ताजा मामला और भी चिंताजनक है। 6 जनवरी की रात करीब एक बजे दैनिक जागरण Inext के दो मीडियाकर्मी कार्यालय से काम खत्म कर घर लौट रहे थे। कोकर स्थित सुभाष चौक के पास बाइक सवार दो असामाजिक तत्वों ने छिनतई के इरादे से उन पर अचानक जानलेवा हमला कर दिया। यह सिर्फ एक छिनतई की घटना नहीं थी, बल्कि यह राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर सीधा हमला था।

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ग्रामीणों की सतर्कता से टली बड़ी अनहोनी
इस वारदात के बाद इलाके में कुछ देर के लिए अफरा-तफरी मच गई। गनीमत यह रही कि स्थानीय ग्रामीणों ने साहस और एकजुटता का परिचय दिया। उन्होंने आरोपियों का पीछा कर उन्हें पकड़ लिया और कानून को हाथ में लेने के बजाय पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए दोनों आरोपियों के खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई की।

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क्या हर बार नागरिक ही बचाएंगे हालात?
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता। क्या हर बार आम नागरिकों को ही आगे बढ़कर अपराधियों को पकड़ना पड़ेगा? अगर समय रहते स्थानीय मदद के लिए नहीं पहुंचते, तो क्या किसी बड़ी अनहोनी से इनकार किया जा सकता था? यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

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रात भी असुरक्षित, दिन भी नहीं सुरक्षित
आज हालात ऐसे हो चुके हैं कि राजधानी में न रात सुरक्षित है और न ही दिन। चौक-चौराहों से लेकर मुख्य सड़कों तक अपराधियों का दुस्साहस खुलेआम दिखाई दे रहा है। अगर मीडियाकर्मी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता की सुरक्षा की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

प्रशासन कब जागेगा?
अब भी अगर प्रशासन नहीं चेता, तो सवाल और भी गहरे होंगे। सिर्फ घटनाओं के बाद कार्रवाई से बात नहीं बनेगी। जरूरत है सख्त और दिखने वाली पुलिसिंग की, ताकि अपराधियों के मन में कानून का डर दोबारा पैदा हो।

जनता सवाल पूछ रही है
रांची की जनता आज जवाब चाहती है। क्या वाकई राजधानी में जंगलराज कायम हो चुका है और अगर नहीं, तो फिर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं?

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