डी.ए.वी. नंदराज में दो दिवसीय वैदिक कार्यशाला का भव्य समापन, शोभायात्रा के साथ संस्कारों का संदेश
Ranchi : डी.ए.वी. नंदराज पब्लिक स्कूल, बरियातू में आयोजित दो दिवसीय वैदिक कार्यशाला का शांति पाठ के साथ सफल समापन हुआ। कार्यशाला का शुभारंभ पहले दिन हवन-यज्ञ से किया गया था, जिसने पूरे कार्यक्रम को वैदिक ऊर्जा, अनुशासन और आध्यात्मिक वातावरण से जोड़ दिया। यह कार्यशाला विद्यार्थियों में संस्कार, नैतिकता और चरित्र निर्माण की दिशा में एक प्रेरणादायी प्रयास के रूप में सामने आई।
इस कार्यशाला में कक्षा सातवीं से बारहवीं तक के विद्यार्थियों के साथ-साथ विद्यालय के लगभग 70 शिक्षक-शिक्षिकाओं ने सक्रिय सहभागिता निभाई। कार्यक्रम में आर्य समाज और आर्य ज्ञान प्रचार समिति से जुड़े कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। मुख्य रूप से आर्य ज्ञान प्रचार समिति, रांची के प्रधान शत्रुघ्न लाल गुप्ता, आर्य समाज मंदिर रांची की आजीवन संरक्षिका सुशीला गुप्ता, विद्यालय के प्रधान प्रेम प्रकाश आर्य, सचिव पुनित पोद्दार, आर्य समाज रांची के प्रधान राजेन्द्र आर्य, मंत्री अजय आर्य, कोषाध्यक्ष संजय पोद्दार, सुनील गुप्ता, कैलाश प्रिंटिंग प्रेस के मुकेश जी सहित अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।

कार्यशाला के अंतिम दिन विद्यालय के विद्यार्थियों ने बूटी मोड़ तक विशाल शोभायात्रा निकाली। हाथों में स्लोगन और चेतना का संदेश लिए छात्र समाज से बुराइयों को मिटाने और अच्छे संस्कार अपनाने का संकल्प दोहराते नजर आए। यह शोभायात्रा विद्यार्थियों में सामाजिक जागरूकता और सकारात्मक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया।
इस वैदिक कार्यशाला के मुख्य उपदेशक अंतरराष्ट्रीय विद्वान आचार्य संजीव रूप जी (उत्तर प्रदेश) रहे। अपने प्रवचन में उन्होंने संस्कार और चरित्र निर्माण पर गहरी बात रखते हुए कहा कि “चित्र देखकर चरित्र निर्माण की यात्रा ही संस्कार है।” उन्होंने कहा कि मूर्ति और महापुरुषों के चित्र हमें जीवन में सच्चाई, अनुशासन और श्रेष्ठ चरित्र अपनाने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री, स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों को आदर्श बताते हुए विद्यार्थियों को उनके विचारों से सीख लेने का संदेश दिया।

आचार्य संजीव रूप ने शिक्षकों को संबोधित करते हुए ईमानदारी और नैतिकता को जीवन का मूल आधार बताया। उन्होंने कहा कि ईमानदारी की कमाई से पला बच्चा कभी बेईमान नहीं बनता, क्योंकि संस्कार घर और विद्यालय दोनों जगहों से व्यक्ति के स्वभाव में उतरते हैं।
विद्यालय के प्राचार्य डॉ. रवि प्रकाश तिवारी ने भी विद्यार्थियों को प्रेरक संदेश देते हुए कहा—
“उठो, जागो और तब तक प्रयत्न करो जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए— यही वेद और उपनिषद की शिक्षा है।”
उन्होंने बताया कि इस वर्ष कार्यशाला को डिजिटल माध्यम से भी जोड़ा गया, जहां क्यूआर कोड के जरिए ऑनलाइन प्रश्नोत्तरी आयोजित की गई और विजेताओं के लिए पुरस्कार व्यवस्था भी की गई। यह पहल परंपरा और तकनीक के संतुलन का एक बेहतरीन उदाहरण बनी।
विद्यालय के प्रधान प्रेम प्रकाश आर्य ने कहा कि डी.ए.वी. नंदराज का लक्ष्य विद्यार्थियों में केवल शैक्षणिक ज्ञान नहीं बल्कि कार्य-कौशल, चरित्र निर्माण, राष्ट्रप्रेम और एक जिम्मेदार नागरिक के गुण विकसित करना है। उन्होंने कहा कि समाज के लिए एक अच्छे इंसान का निर्माण विद्यालय की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

आचार्य संजीव रूप जी ने सरस्वती पूजा का महत्व समझाते हुए कहा कि हंस की तरह सही-गलत का विवेक और वीणा वादन की तरह मधुर आचरण ही वास्तविक विद्या है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अच्छे कर्म ही सच्चा धर्म हैं, और यही जीवन का सर्वोच्च संस्कार है।
अंत में शांति पाठ के साथ दो दिवसीय वैदिक कार्यशाला का समापन हुआ। यह आयोजन विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए न केवल आध्यात्मिक अनुभव रहा, बल्कि जीवन में नैतिक मूल्यों और संस्कारों को अपनाने की दिशा में एक प्रभावी प्रेरणा भी बना।








