झारखंड के मेगालीथ को मिलेगी वैश्विक पहचान, दावोस-यूके यात्रा में उठेगा संरक्षण का मुद्दा
Ranchi: झारखंड की धरती केवल खनिज और औद्योगिक संभावनाओं के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत के लिए भी वैश्विक स्तर पर पहचानी जाने लगी है। राज्य में मौजूद मेगालीथ (वृहत् पाषाण), प्राचीन गुफा-भित्ति चित्र, और जीवाश्मयुक्त वन प्रांतर अब अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की आगामी दावोस और यूनाइटेड किंगडम यात्रा में झारखंड की यह प्राचीन धरोहर भी खास एजेंडे के तौर पर सामने आएगी।
सरकार का प्रयास है कि दुनिया यह समझे कि झारखंड का सिंहभूम क्षेत्र वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की उन शुरुआती जमीनों में शामिल है, जो समुद्र से सबसे पहले ऊपर उठी थीं। वहीं झारखंड के कई क्षेत्रों में पंक्तिबद्ध रूप से खड़े मेगालीथ सूर्य की गति, दिन-रात की अवधि और खगोलीय घटनाओं से जुड़े संकेत देते हैं। इसे इतिहास, विज्ञान और मानवीय चेतना की साझा विरासत माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री की विदेश यात्रा के दौरान प्रतिनिधिमंडल झारखंड की मेगालीथ संस्कृति और भू-दृश्य की निरंतरता को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करेगा। उद्देश्य यह है कि वर्षों से उपेक्षित रहे इन वृहत पाषाणों को विश्व धरोहर के रूप में पहचान और सम्मान मिल सके, साथ ही उनके संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग का मार्ग भी खुले।

विरासत संरक्षण का नया मॉडल बनेगा झारखंड
झारखंड का यह प्रागैतिहासिक भू-दृश्य किसी संग्रहालय की दीवारों में बंद नहीं, बल्कि आज भी सुदूर गांवों और जंगलों के बीच जीवित है। यह दर्शाता है कि विरासत को समुदायों के साथ जोड़कर, उसी स्थान पर सुरक्षित रखने का मॉडल झारखंड पेश कर सकता है। यह मॉडल भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच नैतिक संरक्षण, संग्रहालय साझेदारी, और अनुसंधान सहयोग जैसे वैश्विक मानकों से भी मेल खाता है।
यूके के स्टोनहेंज से कम नहीं झारखंड
विशेष रूप से हजारीबाग के पकरी बरवाडीह में स्थित मेगालीथ संरचनाओं को लेकर यह बात सामने आई है कि उनका संबंध इक्वीनॉक्स (दिन-रात बराबर होने की खगोलीय घटना) और सूर्य की दिशा से है। यही वजह है कि इन संरचनाओं की तुलना यूके के स्टोनहेंज जैसे प्रसिद्ध वैश्विक स्थलों से की जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह उन मानवीय प्रवृत्तियों का प्रमाण है, जिनमें समय, मृत्यु और ब्रह्मांडीय व्यवस्था को पत्थरों में अंकित किया गया।
शैल चित्र, सोहराय-कोहबर और फॉसिल का अनोखा संगम
झारखंड के इस्को के शैल चित्र, और सोहराय-कोहबर पेंटिंग की आज भी जीवित सांस्कृतिक परंपरा यह प्रमाण देती है कि यहां प्राचीन काल और आधुनिक मानव संस्कृति एक ही भूगोल में सह-अस्तित्व के साथ मौजूद है। वहीं मंडरो क्षेत्र में जीवाश्म (फॉसिल) आधारित भू-दृश्य झारखंड को वैश्विक शोध और भू-विज्ञान के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
मुख्यमंत्री के नेतृत्व में यह प्रयास केवल सांस्कृतिक पहल नहीं, बल्कि विकास के व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा माना जा रहा है। सरकार का संदेश स्पष्ट है कि किसी भी राज्य का दीर्घकालिक विकास आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ सांस्कृतिक निरंतरता और ऐतिहासिक सम्मान पर आधारित होना चाहिए। पाषाण युग से आधुनिक विकास तक का यह सफर झारखंड को एक ऐसी पहचान देता है, जिसे दुनिया अब और करीब से जानने को उत्सुक है








