राष्ट्रीय गीत से राजनीति तक: वंदे मातरम पर क्यों भिड़ी BJP और कांग्रेस
नई दिल्ली: ‘वंदे मातरम’—एक ऐसा गीत जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा कहा जाता है। लेकिन आज, इसके 150 साल पूरे होने के मौके पर, यही राष्ट्रीय गीत संसद में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव का विषय बन गया है। सवाल उठता है कि आखिर देशभक्ति के इस प्रतीक पर राजनीति क्यों और कैसे हो रही है? इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें इतिहास, संविधान और वर्तमान सियासत—तीनों स्तरों पर जाना होगा।
वंदे मातरम का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने की थी। यह गीत पहली बार 7 नवंबर 1875 को ‘बंगदर्शन’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ। आजादी की लड़ाई के दौरान—
- यह गीत ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बना
- लाठीचार्ज और जेल जाने वाले क्रांतिकारियों की जुबान बना
- 1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन में इसकी गूंज देशभर में फैली
इसी ऐतिहासिक भूमिका के कारण 1947 में इसे भारत का राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला, जबकि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बना।
अब संसद में विवाद क्यों खड़ा हुआ?
वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर संसद में विशेष चर्चा रखी गई। लोकसभा में पीएम मोदी, राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने इसकी विरासत और राष्ट्रवादी भावना पर जोर दिया। यहीं से BJP-कांग्रेस के बीच मतभेद सामने आए।
BJP का पक्ष क्या है?
बीजेपी का कहना है—
- वंदे मातरम भारत की राष्ट्रीय चेतना और संस्कृति का प्रतीक है
- यह केवल गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की ऊर्जा रहा है
- इसे लेकर किसी भी तरह की आपत्ति राष्ट्रवादी भावना को कमजोर करने वाली है बीजेपी नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस और विपक्ष बार-बार ऐसे मुद्दों पर “अनावश्यक संवेदनशीलता” दिखाकर तुष्टिकरण की राजनीति करते हैं।
कांग्रेस को आपत्ति किस बात पर है?
कांग्रेस का रुख थोड़ा अलग है। पार्टी वंदे मातरम के सम्मान पर नहीं, बल्कि— उसके कुछ शब्दों की बाध्यता और सरकारी दबाव के स्वरूप पर सवाल उठाती रही है। कांग्रेस का तर्क है कि—
- संविधान किसी को किसी विशेष गीत के गायन के लिए बाध्य नहीं करता
- धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता वाले देश में प्रतीकों का प्रयोग सम्मान के साथ, लेकिन दबाव के बिना होना चाहिए | कांग्रेस यह भी कहती है कि BJP राष्ट्रवादी प्रतीकों को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश करती है।
संवैधानिक पहलू क्या कहता है?
कानून न स्थिति साफ है— वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत है, इसका सम्मान अनिवार्य है लेकिन इसे गाना कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं | सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि देशभक्ति को किसी प्रतीक तक सीमित नहीं किया जा सकता।
तो असली टकराव किस बात पर है?
असल में यह लड़ाई—गीत की नहीं, सम्मान की नहीं, बल्कि देशभक्ति की परिभाषा पर नियंत्रण की है| बीजेपी इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़ती है, कांग्रेस इसे संवैधानिक राष्ट्रवाद के दायरे में रखना चाहती है। वंदे मातरम आज भी उतना ही पवित्र और ऐतिहासिक है जितना आजादी के दौर में था। लेकिन राजनीति ने इसे एक बार फिर विचारधाराओं की जंग में खड़ा कर दिया है।
सवाल यही है—
क्या राष्ट्रभक्ति को प्रतियोगिता बनाया जाना चाहिए? या फिर इतिहास से प्रेरणा लेकर भविष्य की एकता पर ध्यान देना चाहिए?यह बहस अभी जारी रहेगी, लेकिन सच यही है कि वंदे मातरम भारत की आत्मा का हिस्सा है—किसी एक पार्टी का नहीं।








