बोतल बंद, मगर कारोबार चालू — बिहार की शराबबंदी की पोल खुली
पीने वाले जेल में, बनाने वाले मालामाल — कानून का असली चेहरा
पटना : बिहार में शराबबंदी लागू हुए नौ साल बीत चुके हैं, लेकिन अवैध शराब का कारोबार और उससे जुड़ी मौतें लगातार सामने आ रही हैं। सवाल उठ रहा है — जब राज्य में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध है, तो जहरीली शराब बन कैसे रही है? और क्यों चुनावी मौसम में कुछ राजनीतिक दल इस कानून में बदलाव की बात करने लगे हैं?
अवैध कारोबार की हकीकत: “मांग है, तो सप्लाई का रास्ता भी निकल आता है”
सरकारी रिकॉर्ड में शराबबंदी सख्त है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। सीमावर्ती जिलों में हर महीने हजारों लीटर शराब पकड़ी जाती है। कई मामलों में स्थानीय पुलिस और प्रशासन की मिलीभगत के आरोप भी लगते हैं।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “कानून कितना भी सख्त क्यों न हो, जब तक मांग खत्म नहीं होगी, आपूर्ति का रास्ता निकल ही आता है। यही बिहार की असल चुनौती है।”
स्थानीय स्तर पर शराब बनाने का एक पूरा नेटवर्क है — गाँवों में कच्ची भट्ठियाँ, छोटे गुप्त गोदाम और ट्रक से आने वाली सप्लाई। ये सब मिलकर करोड़ों का अवैध बाजार खड़ा कर चुके हैं। जो कभी “परिवार बचाने का कानून” कहा गया था, वही अब माफिया के लिए “कमाई का जरिया” बन गया है।
जहरीली शराब से तबाह परिवार — दर्द जो कानून नहीं मिटा सका
राज्य के कई जिलों में हर साल जहरीली शराब से मौतें होती हैं। सबसे ज़्यादा दर्दनाक पहलू यह है कि ऐसे मामलों में गरीब परिवारों के लोग ही शिकार बनते हैं — जो कच्ची शराब की सस्ती बोतल में मौत खरीद लेते हैं।
छपरा जिले के एक पीड़ित परिवार की महिला ने कहा, “सरकार ने शराबबंदी तो कर दी, लेकिन हमारे आदमी की जान भी ले ली। अब न शराब बंद है, न इंसाफ मिला है।”
मुआवजे और न्याय की मांग करने वाले कई पीड़ित परिवार वर्षों से भटक रहे हैं। न तो दोषियों को सजा मिलती है, न जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर शराबबंदी का उद्देश्य समाज को नशामुक्त बनाना था, तो नीति को “मानवीय” दृष्टिकोण से लागू किया जाना चाहिए था — न कि सिर्फ दंडात्मक तरीके से।
राजनीति में शराबबंदी — वादे से बहस तक
अब चुनावी मौसम में शराबबंदी का मुद्दा फिर से राजनीतिक अखाड़े में उतर आया है।
कुछ विपक्षी दल इसे “असफल प्रयोग” बताते हुए कहते हैं कि कानून में संशोधन ज़रूरी है। उनका तर्क है कि “पूर्ण प्रतिबंध के बजाय नियंत्रित और लाइसेंस्ड बिक्री”* बेहतर विकल्प हो सकता है।
एक पार्टी प्रवक्ता ने कहा, “राज्य का राजस्व घटा, अवैध कारोबार बढ़ा और पुलिस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे — अब वक्त है नीति की समीक्षा का।”
वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब भी अपने रुख पर अडिग हैं। वे कहते हैं कि “शराबबंदी महिलाओं की मांग पर लागू की गई थी और इससे लाखों परिवारों की खुशियां लौटी हैं।” लेकिन हकीकत यह है कि अब शराबबंदी “सामाजिक नीति” से ज़्यादा “राजनीतिक एजेंडा” बन चुकी है।
कानून बनाम ज़मीन की सच्चाई
बिहार सरकार ने दावा किया था कि शराबबंदी से घरेलू हिंसा और अपराध के मामलों में कमी आई है। कुछ रिपोर्टें इस दावे का समर्थन भी करती हैं। लेकिन दूसरी ओर, अदालतों पर शराबबंदी से जुड़े मामलों का भारी बोझ पड़ा है — हजारों लोग मामूली आरोपों में जेलों में बंद हैं।
एक समाजशास्त्री का कहना है, “शराबबंदी कानून ने सामाजिक संदेश तो दिया, लेकिन कार्यान्वयन के स्तर पर यह बहुत जटिल हो गया है। इससे प्रशासनिक तंत्र भ्रष्ट और आम जनता असहाय हुई है।”
क्या बैन का मकसद पूरा हुआ?
नीति विशेषज्ञों का कहना है कि शराबबंदी के उद्देश्य तो नेक थे, लेकिन उसका मॉडल अधूरा था। नशा-मुक्ति केंद्रों का अभाव, वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की कमी और प्रवर्तन में ढिलाई — ये सब कारण हैं जिनसे शराबबंदी अधूरी साबित हुई।
वास्तव में, शराबबंदी एक सामाजिक सुधार का अभियान था, जिसे पुलिसिंग में तब्दील कर दिया गया। जब तक जनता खुद इस नीति को आत्मसात नहीं करेगी, तब तक यह केवल कानून की किताब में बंद रहेगी।
रास्ता क्या है?
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि राज्य सरकार को अब “संतुलित नीति” अपनानी चाहिए —
- न तो पूर्ण प्रतिबंध हटाया जाए,
- न ही अवैध कारोबार को बढ़ावा मिले।
इस बीच, पब्लिक हेल्थ मॉडल और नशा-निवारण शिक्षा को प्राथमिकता दी जा सकती है। साथ ही, पीड़ित परिवारों को न्याय और आर्थिक राहत देना इस नीति की नैतिक जिम्मेदारी है।
बिहार की शराबबंदी ने समाज को एक बड़ा संदेश दिया — लेकिन यह संदेश तब अधूरा रह जाता है जब लोग कानून के बावजूद मर रहे होंराजनीतिक दल इसे अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं, पर असल सवाल यह है कि — क्या इस कानून का लाभ आम आदमी तक पहुंचा, या यह सिर्फ़ सत्ता और सियासत का हथियार बन गया?








