2004 से 2025: कुड़मी/कुरमी को ST में शामिल करने की अनुशंसा का अधूरा सफर

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रांची से अमित: झारखंड सरकार द्वारा दिनांक 04 दिसंबर 2004 को केंद्र सरकार को भेजा गया एक पत्र आज फिर से सुर्खियों में है। इस पत्र में राज्य की कुछ जातियों को अनुसूचित जनजाति (ST) सूची में शामिल करने की अनुशंसा की गई थी — और दूसरे पृष्ठ पर “कुरमी/कुड़मी” समाज को ST में शामिल करने की सिफारिश दर्ज थी।

लेकिन अब जब इस दस्तावेज़ को लेकर नई राजनीतिक हलचल मची है, तो यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि क्या इतनी गंभीर अनुशंसा बिना ठोस आधार के भेजी गई थी?

अनुशंसा पत्र में तथ्य या औपचारिकता?
पत्र की भाषा और तर्कों पर नजर डालें तो यह एक साधारण ऐतिहासिक विवरण जैसा प्रतीत होता है। TRI (Tribal Research Institute) ने इस अनुशंसा का समर्थन नहीं किया था, बावजूद इसके यह प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया। पत्र में उल्लेख है कि यह निर्णय 22 और 23 नवंबर 2004 की कैबिनेट बैठकों में लिया गया था।

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तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, और मंत्रीमंडल के सदस्य सुदेश महतो, जलेश्वर महतो और दिवंगत लालचंद महतो सभी उस बैठक का हिस्सा थे। ऐसे में सवाल उठता है कि जब TRI की राय नकारात्मक थी, तो क्या मंत्रियों ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं की? क्या इस संवेदनशील विषय पर पर्याप्त अध्ययन और सामाजिक विमर्श हुआ?

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2005 से 2019 तक — सरकारें बदलीं, लेकिन मुद्दा वहीं रुका
झारखंड की राजनीति ने इसके बाद कई उतार-चढ़ाव देखे। 2005 में फिर अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में सरकार बनी, जिसमें सुदेश महतो और चंद्रप्रकाश चौधरी मंत्री बने। इस कार्यकाल में भी यह मुद्दा गौण ही रहा।

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इसके बाद 2006 में मधु कोड़ा सरकार बनी इस बार भी चंद्रप्रकाश चौधरी मंत्री रहे, पर कुरमी/कुड़मी ST मुद्दे पर कोई प्रगति नहीं हुई।

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2010 में जब झामुमो के नेतृत्व में सरकार बनी, तब दल के तीन मंत्री सुदेश महतो, चंद्रप्रकाश चौधरी और उमाकांत रजक सरकार में थे, पर यह विषय फिर पीछे छूट गया। सरकार 5 महीने में अल्पमत में आ गई और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

2010 से 2013: तीसरी बार मुंडा सरकार, फिर वही स्थिति
जनवरी 2010 में पुनः अर्जुन मुंडा की सरकार बनी। सुदेश महतो और चंद्रप्रकाश चौधरी फिर मंत्री बने। लेकिन इस सरकार में भी ST अनुशंसा पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। जनवरी 2013 में सरकार गिर गई, और यह मुद्दा फिर फाइलों में दफन हो गया।

रघुवर दास सरकार में भी खामोशी
2014 में जब रघुवर दास मुख्यमंत्री बने, तब चंद्रप्रकाश चौधरी मंत्री बने और कुछ समय के लिए रामचंद्र शाहिस भी मंत्री पद पर रहे। इस कार्यकाल में भी कुड़मी/कुरमी ST अनुशंसा पर चर्चा तक नहीं हुई।

इसके उलट, इसी दौर में अखिल भारतीय कुरमी महासभा के महिला प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अधिवेशन रांची में हुआ, जिसमें केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कहा था —

“आप ST क्यों बनना चाहते हैं? लोग आगे बढ़ना चाहते हैं और आप पीछे जाना चाहते हैं।”
यह बयान उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स में प्रमुखता से छपा था ।

जनता के सवाल — गंभीर मुद्दे पर इतनी चुप्पी क्यों?
अब सवाल उठ रहे हैं कि जब कई बार सत्ता में प्रतिनिधित्व रहा, तब इस विषय को क्यों अनदेखा किया गया? क्यों मंत्री रहते हुए भी किसी ने इस अनुशंसा पर ठोस कार्यवाही नहीं की? क्यों किसी ने समर्थन वापस लेकर या इस्तीफ़ा देकर सरकार पर दबाव नहीं बनाया? जब यह विषय अब जनता के बीच भावनात्मक रूप से उभरा है, तो पहले यह मौन क्यों रहा?

इतिहास गवाह है कि आंदोलनों की दिशा तब बदली जब नेतृत्व ने साहस दिखाया — जैसे सूर्य सिंह बेसरा ने अपनी विधायकी छोड़कर झारखंड आंदोलन को नई धार दी थी।

अब की स्थिति — एकजुटता या दोहरा चरित्र?
आज जब कुरमी/कुड़मी समाज पहली बार इतने संगठित रूप में आंदोलनरत है, तो यह सवाल भी गूंज रहा है कि क्या राजनीतिक दलों में इस मुद्दे पर एकमतता है?
एक ओर कुछ नेता समर्थन की बात करते हैं, वहीं उनके दल के ही अन्य नेता विरोध दर्ज कर रहे हैं। मीडिया में दिए गए बयानों ने कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है।

2004 का वह पत्र अब सिर्फ एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीतिक संवेदनशीलता की परख का प्रतीक बन चुका है। 21 साल बीत जाने के बाद भी जब यह सवाल जस का तस है — तो जनता पूछ रही है:

“कुरमी/कुड़मी को ST में शामिल करने की अनुशंसा — आखिर किसकी ज़िम्मेदारी थी, और अब कौन निभाएगा?”

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