बिहार में बीजेपी की सुनामी, फिर भी नीतीश ‘अस्पृश्य’ क्यों? राजनीति की असली चाभी दिल्ली में छिपी
बिहार: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे इस बार एक अलग ही राजनीतिक तूफ़ान लेकर आए हैं। रुझानों ने साफ कर दिया है कि बीजेपी और एनडीए की आंधी में विपक्ष पूरी तरह धराशायी हो चुका है। बीजेपी अकेले इतनी सीटें लाती दिख रही है कि चाहे तो बिना जेडीयू के भी लोजपा, रालोमो और हम को साथ लेकर आराम से सरकार बना सकती है।
लेकिन सवाल यह है—
क्या भाजपा नीतीश कुमार को बायपास कर सकती है?
क्या बिहार में दूसरा ‘एकनाथ शिंदे मॉडल’ लागू हो सकता है? क्या नीतीश को किनारे करना भाजपा के लिए संभव भी है?राजनीतिक समीकरण कहते हैं— नहीं। यह इतना आसान नहीं।
बीजेपी के पास बहुमत का गणित तैयार — फिर भी खेल क्यों नहीं सकती ‘सोलो’?
रुझानों के अनुसार:
- BJP → 95 सीटों पर आगे
- LJP → 19 सीटों पर
- HAM → 5 सीटों पर
- RLSP/RLM → 4 सीटों पर
इन चारों को जोड़ दें तो एनडीए बिना जेडीयू के भी 200 के आसपास पहुँच रहा है। मतलब एक साफ संकेत: बीजेपी चाहे तो नीतीश कुमार को बाहर रखकर सरकार बना सकती है। परंतु, राजनीति सिर्फ़ नंबर का खेल नहीं होती— दिल्ली में इसकी चाभी कहीं और है। नीतीश की ‘12 सांसदों वाली चाभी’—एक ऐसी असहज सच्चाई जिसे भाजपा अनदेखा नहीं कर सकती
2024 लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने12 सांसद जीतकर NDA में अपनी ‘नेगोशिएशन पावर’ बेहद मजबूत कर ली।
अगर बिहार में बीजेपी उनको बायपास कर सरकार बनाती है तो:
- नीतीश 12 सांसदों का समर्थन वापस ले सकते हैं
- मोदी सरकार पर सीधे खतरा तो नहीं आएगा
- लेकिन NDA चंद्रबाबू नायडू जैसे सहयोगियों पर निर्भर हो जाएगी
- नायडू की मोलभाव की ताकत बढ़ जाएगी
- केंद्र सरकार को लगातार राजनीतिक दबाव में रहना पड़ेगा
इन हालातों में भाजपा बिहार में नीतीश को नाराज़ कर कोई जोखिम नहीं उठा सकती।
नीतीश को ‘नज़रअंदाज’ कर भाजपा क्यों नहीं कर सकती नया प्रयोग?
इसके कई कारण हैं:
नीतीश अभी भी NDA की राजनीति का ‘सिंबलिक फेस’ हैं
बिहार में NDA को एक स्थिर छवि मिलती है — नीतीश इसे पूरी तरह संतुलित करते हैं।
- बिहार में जेडीयू का वोट बैंक BJP का ‘नेचुरल वोट’ नहीं है
- नीतीश हटे तो जेडीयू का वोटबैंक टूटकर RJD के पास जा सकता है, BJP के पास नहीं।
- नीतीश को बाहर करना BJP के लिए दीर्घकालिक नुकसान का सौदा
भाजपा बिहार में अब भी सामाजिक समीकरणों का संतुलन पूरी तरह नहीं साध पाई है। जेडीयू का तिलमिलाया हुआ वोट NDA का नुकसान करेगा।
NDA में कौन किसके करीब? यह भी नीतीश का फायदा बढ़ाता है
- लोजपा भाजपा की सीधी सहयोगी
- रालोमो भाजपा से टिकट पाती रही है
- हम भाजपा की पारंपरिक मित्र पार्टी
- जेडीयू की इन दलों से दूरी पुरानी है।
यानी पूरा NDA इन दिनों भाजपा-प्रभावित है, जेडीयू इसमें एक अलग इकाई है। इसीलिए नीतीश इन दलों की “मजबूरी” नहीं, बल्कि भाजपा की रणनीति का अनिवार्य हिस्सा हैं।
क्या नीतीश राजनीति से दूर होने पर BJP फायदा उठा लेगी?
नीतीश उम्र के उस चरण में पहुँच चुके हैं जहाँ आने वाले कुछ वर्षों में वे सक्रिय राजनीति से दूरी बना सकते हैं।
उस स्थिति में:
BJP जेडीयू के वोटबैंक पर दावा कर सकती है लेकिन जेडीयू पर कब्ज़ा करना संभव नहीं सिर्फ़ उस वोटबैंक को धीरे-धीरे अपने पक्ष में खींचना संभव है इसलिए भाजपा नीतीश से सीधी टक्कर लेने की बजाय उन्हें धीरे-धीरे किनारे करने की रणनीति अपना सकती है।
तो क्या बिहार में BJP “नई सरकार” बनाएगी?
राजनीतिक संकेत बिल्कुल साफ हैं:
बीजेपी अभी यह जोखिम नहीं उठाएगी नीतीश को शांत रखकर ही आगे बढ़ेगी केंद्र में 12 सांसद — भाजपा की मजबूरी
भाजपा बिहार में अपनी लंबी लड़ाई खेल रही है, तत्काल प्रयोग नहीं मोदी–शाह इसे ‘तूफ़ान’ की तरह चलाएंगे, ‘तख्तापलट’ की तरह नहीं बिहार में चाहे जितनी आंधी आई हो, लेकिन नीतीश कुमार अभी भी NDA के लिए—
- “जोखिम का क्षेत्र” नहीं,
- “जरूरत का स्तंभ” हैं।
भाजपा चाहे तो सरकार बना सकती है… लेकिन सत्ता का गणित दिल्ली में तय होता है, पटना में नहीं।








