हेसला पंचायत में विस्थापित प्रभावित संघर्ष मोर्चा की बैठक, मुआवजा और पुनर्वास पर उठे सवाल
रामगढ़ (झारखंड): पतरातू प्रखंड के हेसला पंचायत में विस्थापित प्रभावित संघर्ष मोर्चा की एक आवश्यक बैठक आयोजित की गई, जिसमें भूमि अधिग्रहण, मुआवजा और पुनर्वास के मुद्दे पर गंभीर चर्चा हुई। बैठक की अध्यक्षता आदित्य नारायण प्रसाद ने की, जबकि संचालन प्रदीप महतो द्वारा किया गया।
1961-62 में हुआ था भूमि अधिग्रहण
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि हेसला की जमीन वर्ष 1961-62 में अधिग्रहित की गई थी, लेकिन आज तक यहां के विस्थापितों को न तो समुचित मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास की कोई ठोस व्यवस्था की गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि आज भी ग्रामीण अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती-बाड़ी कर जीविकोपार्जन कर रहे हैं और कुछ लोग वर्षों से बने आवासों में रह रहे हैं।
हाईकोर्ट के आदेश को लेकर भ्रम
बैठक में यह भी आरोप लगाया गया कि 12 फरवरी 2026 को कुछ लोगों को जमीन खाली करने के लिए कहा गया और इसे उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देकर प्रस्तुत किया गया। हालांकि, मोर्चा के पदाधिकारियों का कहना है कि माननीय उच्च न्यायालय ने ऐसा कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया है। न्यायालय ने केवल यह कहा है कि संबंधित भूमि राज्य सरकार के अधीन है और सरकार चाहे तो खाली करा सकती है या नहीं भी करा सकती है।
दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने का आरोप
बैठक में यह भी बताया गया कि हेसला के रैयतों ने इस मामले में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। न्यायालय द्वारा भूमि अधिग्रहण से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया है, लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई ठोस दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया गया है।
मोर्चा के सदस्यों ने आरोप लगाया कि बिना स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया और दस्तावेजों के लोगों को जमीन खाली करने का दबाव बनाया जा रहा है, जो न्यायसंगत नहीं है।
आगे की रणनीति
बैठक में निर्णय लिया गया कि विस्थापितों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा। मोर्चा ने स्पष्ट किया कि जब तक मुआवजा और पुनर्वास की स्पष्ट नीति लागू नहीं होती, तब तक वे अपनी जमीन और अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे।
हेसला पंचायत का यह मुद्दा अब एक बार फिर से क्षेत्रीय राजनीति और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।








