सीजेआई गवई बोले- बालिकाओं की सुरक्षा का मतलब सिर्फ शरीर की रक्षा नहीं, बल्कि उन्हें भयमुक्त बनाना है
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश B. R. Gavai ने शनिवार को कहा कि बालिकाओं की सुरक्षा का मतलब केवल उनके शरीर की रक्षा करना नहीं है, बल्कि उन्हें भय से मुक्त करना है। उन्होंने ऐसे समाज के निर्माण पर जोर दिया जहां बालिकाएं सम्मान के साथ सिर ऊंचा रख सकें और जहां उनकी आकांक्षाएं शिक्षा और समानता से पोषित हों।
यह संबोधन Supreme Court of India की किशोर न्याय समिति द्वारा UNICEF India के सहयोग से आयोजित राष्ट्रीय वार्षिक हितधारक परामर्श कार्यक्रम में दिया गया। कार्यक्रम का विषय था — “बालिकाओं की सुरक्षा: भारत में उनके लिए सुरक्षित और सक्षम वातावरण की स्थिति”।
“सुरक्षा का मतलब सिर्फ शरीर नहीं, आत्मा की आज़ादी भी है”
सीजेआई गवई ने अपने संबोधन में Rabindranath Tagore की कविता “Where the Mind is Without Fear” का ज़िक्र करते हुए कहा कि बालिकाओं की सुरक्षा तभी सार्थक होगी जब वे किसी भी भय में नहीं रहेंगी।
“यह दृष्टिकोण तब तक अधूरा रहेगा जब तक हमारे देश में कोई भी लड़की हिंसा, भेदभाव या अवसरों से वंचित किए जाने के भय में रहेगी,” — सीजेआई गवई उन्होंने कहा कि बालिकाओं की आत्मा को स्वतंत्र करना, उन्हें शिक्षा और समानता का अवसर देना ही असली सुरक्षा है।
डिजिटल युग में बढ़ी नई चुनौतियां
सीजेआई गवई ने कहा कि डिजिटल युग में बालिकाओं के लिए खतरे और भी जटिल हो गए हैं। ऑनलाइन उत्पीड़न, साइबर धमकी, डिजिटल स्टॉकिंग, डीपफेक तस्वीरों और व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग ने बालिकाओं की असुरक्षा को और बढ़ा दिया है। उन्होंने विशेष कानूनों के निर्माण और कानून प्रवर्तन एजेंसियों, शिक्षकों व नीति निर्माताओं के प्रशिक्षण पर जोर दिया ताकि वे इन चुनौतियों का संवेदनशीलता के साथ सामना कर सकें।
“तकनीक सशक्तिकरण के साथ नई कमजोरियां भी लेकर आती है। हमें संवेदनशील और समय पर प्रतिक्रिया देनी होगी,” — सीजेआई गवई
पितृसत्तात्मक परंपराओं को तोड़ने पर जोर
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत में कई बालिकाएं अब भी संवैधानिक और कानूनी गारंटी के बावजूद अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। यह कमजोरी उन्हें यौन शोषण, कुपोषण, भ्रूण हत्या, तस्करी और बाल विवाह जैसी बुराइयों के प्रति संवेदनशील बना देती है।
“हमें उन गहरी जड़ें जमाए पितृसत्तात्मक परंपराओं से बाहर निकलना होगा जो बालिकाओं को उनके अधिकारों से वंचित करती हैं,” — सीजेआई गवई
हितधारकों के लिए संवेदनशील प्रशिक्षण जरूरी
सीजेआई गवई ने कहा कि पुलिस अधिकारियों, शिक्षकों, स्वास्थ्य पेशेवरों और स्थानीय प्रशासकों के प्रशिक्षण में संवेदनशील दृष्टिकोण को शामिल करना आवश्यक है ताकि वे सहानुभूति और समझ के साथ प्रतिक्रिया दे सकें।
यह प्रशिक्षण न केवल बालिकाओं की सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि समाज में भयमुक्त वातावरण बनाने में भी सहायक होगा।
“समान अवसर ही असली नागरिकता की पहचान” — जस्टिस नागरत्ना
किशोर न्याय समिति की अध्यक्ष B. V. Nagarathna ने कहा कि किसी भी युवती को सही मायने में समान नागरिक तभी कहा जा सकता है जब उसे अपने पुरुष समकक्षों की तरह समान अवसर, समर्थन और संसाधन मिलें।
“लड़की को उसकी पहचान के कारण किसी भी बाधा का सामना न करना पड़े, यही समानता का असली रूप है,” — जस्टिस नागरत्ना
“भ्रूण हत्या और बाल विवाह जैसी बुराइयों को खत्म करना होगा” — जस्टिस पारदीवाला
किशोर न्याय समिति के सदस्य J. B. Pardiwala ने कहा कि बालिकाओं की सुरक्षा का अर्थ है उन्हें भ्रूण हत्या, बाल विवाह और भेदभाव जैसी बुराइयों से मुक्त जीवन देने की गारंटी।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट अनुसंधान एवं योजना केंद्र द्वारा तैयार “बाल अधिकार और कानून” पर पुस्तिका भी प्रस्तुत की।
भयमुक्त भारत की दिशा में एक कदम
इस कार्यक्रम में महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी और यूनिसेफ इंडिया की कंट्री रिप्रेजेंटेटिव सिंथिया मैककैफ्रे भी उपस्थित रहीं।
सीजेआई गवई ने कहा —
“जब बालिकाएं स्वतंत्रता और सम्मान के माहौल में पलेगीं, तभी भारत उस ‘स्वतंत्रता के स्वर्ग’ में जागेगा, जिसका सपना टैगोर ने देखा था।”








