गोवा नाइट क्लब अग्निकांड: सरकारी विभाग भी कटघरे में
अरपोरा हादसे के बाद प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल
Goa : गोवा के अरपोरा स्थित चर्चित नाइट क्लब में लगी भीषण आग के बाद अब यह मामला सिर्फ एक हादसे तक सीमित नहीं रहा। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे सरकारी विभागों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती जा रही है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत खुद यह स्वीकार कर चुके हैं कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी और जवाबदेही तय की जाएगी।
इसी बीच राष्ट्रीय अखबार इंडियन एक्सप्रेस द्वारा सामने लाए गए दस्तावेजों ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। इन दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि नाइट क्लब को संचालन के लिए कम से कम सात सरकारी मंजूरियां दी गई थीं, जिनमें ट्रेड लाइसेंस, एक्साइज लाइसेंस, फूड सेफ्टी अप्रूवल और नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) शामिल हैं।
कलेक्टर को सौंपी गई मजिस्ट्रेट जांच
घटना के बाद राज्य सरकार ने उत्तरी गोवा के जिला मजिस्ट्रेट एवं कलेक्टर अंकित यादव को मजिस्ट्रेट जांच की जिम्मेदारी सौंपी है। उनका कार्य यह तय करना है कि हादसे के लिए कौन-कौन जिम्मेदार है और किन स्तरों पर लापरवाही बरती गई। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि जांच निष्पक्ष होगी और दोषी चाहे अधिकारी हों या निजी संचालक, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा।
सरकारी अप्रूवल के दस्तावेजों ने खोले कई राज
इंडियन एक्सप्रेस को जो आधिकारिक दस्तावेज मिले हैं, वे यह बताते हैं कि क्लब को संचालन की अनुमति देने में प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पूरा पालन किया गया था या नहीं, इस पर अब सवाल उठ रहे हैं। इन दस्तावेजों के अनुसार, Being GS Hospitality Goa Arpora LLP नाम की कंपनी इस नाइट क्लब और रेस्टोरेंट का संचालन कर रही थी।
इस कंपनी के पार्टनर सौरभ लूथरा, गौरव लूथरा और अजय गुप्ता हैं। कंपनी ने 28 नवंबर 2023 को अरपोरा स्थित ‘कॉर्डोनिचो अगोर’ नामक लगभग 31,200 वर्ग मीटर जमीन को सुरिंदर कुमार खोसला से लीज पर लिया था। इसके बाद अलग-अलग विभागों से लाइसेंस और अनुमति हासिल की गई।
फायर सेफ्टी और निरीक्षण पर उठे गंभीर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब क्लब को इतनी सारी मंजूरियां दी गईं, तो फायर सेफ्टी मानकों का पालन कैसे किया गया। शुरुआती जांच में सामने आया है कि क्लब के अंदर फायर सेफ्टी सिस्टम या तो अपर्याप्त था या ठीक से कार्य नहीं कर रहा था।
इस हादसे में 25 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें क्लब के कर्मचारी और पर्यटक शामिल हैं। कई लोगों की मौत दम घुटने से हुई, जबकि कुछ की जान जलने से गई। यह स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या फायर सेफ्टी निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित था।
सरकार बनाम सिस्टम: जिम्मेदारी किसकी?
राज्य सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह यह साबित करे कि जांच केवल औपचारिक नहीं होगी। विपक्ष पहले ही सरकार पर आरोप लगा चुका है कि प्रशासनिक लापरवाही के चलते यह हादसा हुआ। वहीं, आम लोगों और पीड़ित परिवारों का भी यही सवाल है कि अगर सब कुछ नियमों के तहत था, तो इतनी बड़ी त्रासदी कैसे हो गई।
आगे क्या? कार्रवाई या सिर्फ बयानबाज़ी?
मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट आने के बाद यह साफ होगा कि सरकारी अधिकारियों, स्थानीय प्रशासन और क्लब संचालकों में से किसकी लापरवाही इस हादसे की मुख्य वजह बनी। मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि रिपोर्ट के आधार पर सख्त कार्रवाई होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ निचले स्तर तक सीमित रहेगी या फिर उन विभागों और अधिकारियों तक भी पहुंचेगी जिन्होंने नाइट क्लब को संचालन की अनुमति दी थी।
गोवा का यह अग्निकांड अब केवल एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुका है।








