झारखंड नगर निकाय चुनाव: गैर-दलीय मैदान, सियासी घमासान तय
Ranchi : झारखंड में नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा अब जल्द होने वाली है। भले ही यह चुनाव औपचारिक रूप से गैर-दलीय हो, लेकिन राजनीतिक मायनों में इसे सत्ता और विपक्ष—दोनों के लिए एक बड़े सेमीफाइनल की तरह देखा जा रहा है। शहरी क्षेत्रों में अपनी मजबूत पकड़ का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव किसी चुनौती से कम नहीं, जबकि सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल पिछले विधानसभा चुनाव में शहरी वोटबैंक में मिले इजाफे से उत्साहित हैं और उसी लय को बनाए रखने की तैयारी में जुटे हैं।
53 वार्डों में जबरदस्त खींचतान
राजधानी रांची के नगर निकाय क्षेत्र में हालात सबसे ज्यादा दिलचस्प हैं। यहां पार्षद से लेकर महापौर तक के पदों पर दावेदारों की लंबी कतार है। रांची नगर निगम के 53 वार्डों में आरक्षण के चलते खींचतान और तेज हो गई है। उदाहरण के तौर पर वर्तमान वार्ड संख्या 34 में पार्षद पद के लिए अरुण कुमार झा और ओमप्रकाश सिंह जैसे नेता पहले ही तैयारी में जुट गए हैं।
बीजेपी में महापौर पद के सबसे ज्यादा दावेदार
महापौर सीट पर सबसे ज्यादा दावेदार भाजपा में नजर आ रहे हैं। अशोक बड़ाईक, रोशनी खलखो, सुजाता कच्छप, नकुल तिर्की और राम कुमार पाहन जैसे नाम चर्चा में हैं। उधर जेएमएम की ओर से अजय तिर्की और कांग्रेस से रमा खलखो के चुनावी मैदान में उतरने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। आजसू, राजद और वाम दलों में भी कमोबेश यही हालात हैं।
पार्टी के भीतर समन्वय सबसे बड़ी चुनौती
नगर निकाय चुनाव में पार्टियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बैठाना होगा। पार्षद जैसे पदों पर दल खुला हस्तक्षेप करने से बच रहे हैं, लेकिन महापौर, नगर परिषद और नगर पंचायत अध्यक्ष के पदों पर अप्रत्यक्ष राजनीतिक समर्थन और रणनीति साफ दिखेगी। इसके लिए अंदरखाने कार्यकर्ताओं को समझाकर सीमित उम्मीदवार उतारने की कवायद तेज है।
बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप सिन्हा मानते हैं कि दावेदारों की संख्या ज्यादा होना स्वाभाविक है, लेकिन आपसी समन्वय से चुनाव लड़ा जाएगा। वहीं जेएमएम के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडे का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व चुनाव की घोषणा के बाद स्थिति संभालने में सफल होगा, ताकि अधिकतम सीटें हासिल की जा सकें।
बीजेपी की शहरी पकड़ दांव पर
शहरी निकाय क्षेत्रों में बीजेपी की मजबूत पकड़ मानी जाती रही है। पिछले चुनाव में रांची, बोकारो, जमशेदपुर, धनबाद, हजारीबाग और चाईबासा जैसे प्रमुख शहरों में पार्टी समर्थक उम्मीदवारों ने शीर्ष पदों पर जगह बनाई थी। इस बार इन्हीं सीटों को दोहराना बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है।
हालांकि, ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने के फैसले ने बीजेपी की चिंता बढ़ा दी है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल जेएमएम-कांग्रेस-राजद गठबंधन पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी शहरी इलाकों में अप्रत्यक्ष रूप से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद लगाए बैठा है।
स्पष्ट है कि गैर-दलीय कहलाने वाला यह चुनाव, झारखंड की राजनीति की दिशा तय करने वाला बड़ा संकेतक साबित हो सकता है।








