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रांची में मां गंधेश्वरी पूजा का भव्य आयोजन, गंधवानिक समाज ने निभाई परंपरा

Maa Gandheshwari Puja

अलकापुरी, रातु रोड में श्रद्धा और उल्लास के साथ हुआ पूजन

रांची: राजधानी रांची में शुक्रवार, 1 मई 2026 को “रांची गंधवानिक समिति” द्वारा कुल देवी श्री श्री मां गंधेश्वरी की पूजा का भव्य आयोजन किया गया। यह आयोजन रातु रोड स्थित अलकापुरी में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के माहौल में संपन्न हुआ।पूजा का शुभारंभ गुरुवार को बेलवरन के साथ किया गया था, जिसके बाद शुक्रवार को विधि-विधान के साथ कलश स्थापना कर मां गंधेश्वरी की पूजा की गई। इस अवसर पर गंधवानिक समाज के सभी सदस्य अपने परिवारों के साथ उपस्थित होकर पूजा में शामिल हुए।

1987 से चली आ रही परंपरा
मां गंधेश्वरी की पूजा वर्ष 1987 से बुद्ध पूर्णिमा के दिन लगातार की जा रही है। यह परंपरा स्वर्गीय सत्यकीनकर दास और उनके परिवार द्वारा शुरू की गई थी, जो अब एक बड़े सामाजिक आयोजन का रूप ले चुकी है। आज यह पूजा “रांची गंधवानिक समिति” के माध्यम से व्यापक स्तर पर आयोजित की जाती है और समाज के लोगों को एक मंच पर जोड़ने का कार्य करती है।

गुप्त नवरात्र के रूप में होती है पूजा
यह पूजा गुप्त नवरात्र के रूप में भी मानी जाती है। मान्यता है कि मां गंधेश्वरी की आराधना से प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। विशेष रूप से सुगंधित वस्तुओं के व्यवसाय से जुड़े गंधवानिक समाज के लोग अपनी उन्नति और समृद्धि के लिए मां की पूजा करते हैं।

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कई जिलों में होता है आयोजन
यह पूजा केवल रांची तक सीमित नहीं है, बल्कि खूंटी, बुंडू, तमाड़ और जमशेदपुर सहित कई क्षेत्रों में भी धूमधाम से आयोजित की जाती है। इससे समाज की सांस्कृतिक एकता और धार्मिक आस्था को मजबूती मिलती है।

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समिति के सदस्यों ने संभाली जिम्मेदारी
पूरे आयोजन का संचालन रांची गंधवानिक समिति के असित कुमार मोदी, विवेक चांद, स्वपन कुमार दास, अशोक कुमार दास, अमर दास, कौशिक चांद, सजल दास, स्वागता दास, बरना दास, खुशबू कुमारी, सुजीत दास और राजेश दास सहित अन्य सदस्यों द्वारा सफलतापूर्वक किया गया। सभी सदस्यों के सहयोग से यह धार्मिक आयोजन शांतिपूर्ण और भव्य तरीके से संपन्न हुआ।

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रांची में आयोजित मां गंधेश्वरी पूजा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और परंपरा को भी सशक्त करती है। हर वर्ष की तरह इस बार भी यह आयोजन श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ, जिसने गंधवानिक समाज की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखा है।

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