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झारखंड का महुआ बनेगा इंटरनेशनल ब्रांड, फूड ग्रेन महुआ का उत्पादन शुरू

Mahua

पलामू से उठी पहल, प्रोसेसिंग प्लांट की तैयारी, ग्रामीणों की आय बढ़ने की उम्मीद

रांची: झारखंड के पारंपरिक महुआ को अब अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। राज्य में पहली बार ‘फूड ग्रेन महुआ’ का उत्पादन शुरू हुआ है, जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की तैयारी चल रही है। इस पहल को पलामू टाइगर रिजर्व और JHAMCOFED मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं।

200 पेड़ों से शुरुआत, गांव बना मॉडल
इस परियोजना के तहत शुरुआती चरण में 200 महुआ पेड़ों को अपनाया गया है और बढ़निया गांव को नोडल केंद्र बनाया गया है। ग्रामीणों को विशेष प्रशिक्षण देकर फूड ग्रेन महुआ उत्पादन की तकनीक सिखाई गई है। अब ग्रामीण पारंपरिक तरीके की जगह वैज्ञानिक प्रक्रिया से महुआ संग्रह और प्रसंस्करण कर रहे हैं।

क्या है फूड ग्रेन महुआ?
आमतौर पर महुआ के फूल जमीन पर गिरने के बाद मिट्टी और धूल से मिल जाते हैं, जिससे उसका उपयोग सीमित हो जाता है। लेकिन नए तरीके में पेड़ों के नीचे जाल बिछाया जाता है, जिससे फूल सीधे साफ सतह पर गिरते हैं। इसके बाद इन्हें उसी जाल पर सुखाया जाता है, जिससे यह पूरी तरह हाइजीनिक फूड ग्रेन के रूप में तैयार होता है। इससे अब महुआ का इस्तेमाल चॉकलेट, बिस्कुट और अन्य खाद्य उत्पादों में किया जा सकेगा।

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दोगुनी कीमत से बढ़ेगी आय
जहां सामान्य महुआ बाजार में 30 से 35 रुपये प्रति किलो बिकता है, वहीं फूड ग्रेन महुआ को करीब 70 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदा जा रहा है। यह खरीद इको डेवलपमेंट समिति के माध्यम से की जा रही है, जिससे ग्रामीणों की आय में सीधा फायदा होगा।

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जंगलों में आग की घटनाएं होंगी कम
महुआ चुनने के लिए अक्सर ग्रामीण जंगलों में आग लगा देते थे, जिससे हर साल सैकड़ों आगजनी की घटनाएं होती थीं। अब नई तकनीक आने के बाद यह प्रवृत्ति कम होने की उम्मीद है, जिससे जंगलों को भी नुकसान कम होगा।

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स्वास्थ्य और पोषण से भरपूर
महुआ सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि पोषण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। आयुर्वेद में इसे ‘कल्प वृक्ष’ और ‘जीवन वृक्ष’ भी कहा जाता है, क्योंकि इससे कई औषधियां भी बनाई जाती हैं।

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शराब से आगे अब नई पहचान
अब तक झारखंड-बिहार में महुआ की पहचान मुख्य रूप से देसी शराब से जुड़ी रही है। लेकिन अब इसे फूड प्रोडक्ट के रूप में नई पहचान दी जा रही है, जिससे इसका मूल्य बढ़ेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर
पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र में करीब 180 गांव हैं, जहां हजारों महुआ के पेड़ मौजूद हैं। मार्च से अप्रैल तक महुआ इन गांवों की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बनता है। अब फूड ग्रेन महुआ के जरिए यह पारंपरिक संसाधन आधुनिक बाजार से जुड़कर ग्रामीणों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।

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