महंगी यूनिफॉर्म, घटिया क्वॉलिटी! क्या है प्राइवेट स्कूलों का खेल?

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पेरेंट्स से वसूली का नया तरीका या संगठित लूट?

मुनादी लाइव : देशभर में कई प्राइवेट स्कूलों पर यह आरोप लगातार लग रहे हैं कि वे पेरेंट्स को यूनिफॉर्म के नाम पर महंगी कीमत चुकाने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जबकि क्वॉलिटी बेहद साधारण या कई मामलों में घटिया होती है। यह सवाल अब गंभीर होता जा रहा है कि क्या यह सिर्फ एक व्यवस्था है या फिर संगठित तरीके से की जा रही वसूली?

आरोप है कि कई स्कूल अपने तय दुकानदारों या वेंडर्स के जरिए यूनिफॉर्म तैयार करवाते हैं। इन यूनिफॉर्म की लागत अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन इन्हें पेरेंट्स को तय दुकानों से ही खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है। खुले बाजार से खरीदने की अनुमति नहीं दी जाती, जिससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है और कीमतें मनमाने तरीके से बढ़ाई जाती हैं।

पेरेंट्स का कहना है कि यूनिफॉर्म की सिलाई और कपड़े की क्वॉलिटी अक्सर खराब होती है, जो कुछ ही महीनों में खराब होने लगती है। इसके बावजूद हर साल या हर सेशन में नई यूनिफॉर्म खरीदने का दबाव बनाया जाता है। इससे अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समस्या पारदर्शिता की कमी और निगरानी के अभाव के कारण बढ़ रही है। कई राज्यों में शिक्षा विभाग ने स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि वे यूनिफॉर्म खरीदने के लिए किसी एक दुकान को अनिवार्य न करें, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पालन कम ही होता है।

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उपभोक्ता अधिकारों के अनुसार, किसी भी संस्था द्वारा ग्राहकों को किसी विशेष विक्रेता से सामान खरीदने के लिए मजबूर करना गलत माना जाता है। ऐसे मामलों में अभिभावक जिला शिक्षा पदाधिकारी या उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

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यह मुद्दा सिर्फ यूनिफॉर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती व्यावसायिकता का भी संकेत देता है। जब शिक्षा सेवा की जगह व्यापार बन जाती है, तो सबसे ज्यादा असर आम परिवारों पर पड़ता है।

अब जरूरत है कि पेरेंट्स इस तरह की प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाएं और प्रशासन भी इस पर सख्त निगरानी सुनिश्चित करे, ताकि शिक्षा के नाम पर हो रही इस तरह की वसूली पर रोक लगाई जा सके।

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