PM मोदी की इजराइल यात्रा: फिलिस्तीन संतुलन या चीन को रणनीतिक संदेश?
भारत की विदेश नीति के दो ध्रुवों के बीच नई कूटनीतिक परीक्षा
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित इजराइल यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भारत ने 100 से अधिक देशों के साथ मिलकर कब्जे वाले वेस्ट बैंक में इजरायली विस्तार की आलोचना की है। यही वजह है कि यह दौरा सिर्फ एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की बदलती विदेश नीति और वैश्विक रणनीतिक संतुलन की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एक ओर भारत का ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के साथ भावनात्मक और राजनीतिक जुड़ाव रहा है, वहीं दूसरी ओर पिछले तीन दशकों में इजराइल के साथ रक्षा, तकनीक और रणनीतिक सहयोग तेजी से मजबूत हुआ है। ऐसे में यह यात्रा भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति का अहम उदाहरण बन सकती है।
इतिहास से वर्तमान तक: कैसे बदले भारत-इजराइल रिश्ते
भारत की विदेश नीति की शुरुआत औपनिवेशिक विरोध और आत्मनिर्णय के सिद्धांत से हुई थी। महात्मा गांधी ने 1938 में फिलिस्तीन मुद्दे पर स्थानीय जनता की सहमति को जरूरी बताया था।
1947 में संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना के खिलाफ भारत ने मतदान किया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक संघीय ढांचे का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, 1950 में भारत ने इजराइल को मान्यता दे दी, लेकिन लंबे समय तक पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए गए।
1990 के दशक के बाद वैश्विक भू-राजनीति बदलने के साथ भारत-इजराइल रिश्तों में तेजी आई और रक्षा, कृषि, साइबर टेक्नोलॉजी व इंटेलिजेंस सहयोग के नए अध्याय खुले।
क्या चीन को संदेश देने की रणनीति है यह दौरा?
विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच भारत अपनी रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करना चाहता है। इजराइल के साथ रक्षा और टेक्नोलॉजी साझेदारी को कई विशेषज्ञ चीन के प्रभाव का संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
इंडो-पैसिफिक और पश्चिम एशिया के बीच भारत की कूटनीतिक सक्रियता यह संकेत देती है कि नई दिल्ली अब सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाना चाहती है।
अरब देशों और फिलिस्तीन के साथ संतुलन कैसे बनाएगा भारत?
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अरब देशों के साथ अपने मजबूत ऊर्जा और आर्थिक संबंधों को बनाए रखते हुए इजराइल के साथ रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाना है।
हाल के वर्षों में भारत ने ‘दो-राष्ट्र समाधान’ के समर्थन को दोहराते हुए फिलिस्तीन के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्तों को भी कायम रखा है। यही वजह है कि पीएम मोदी की यह यात्रा संतुलन साधने वाली कूटनीति का बड़ा उदाहरण मानी जा रही है।
भारतीय कूटनीति का नया दौर
विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अब एक ऐसी रणनीति पर काम कर रहा है जिसमें वह किसी एक ध्रुव पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ समानांतर रिश्ते बनाए रखे।
प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा को इसी ‘संतुलित और बहुस्तरीय कूटनीति’ का हिस्सा माना जा रहा है, जो आने वाले समय में भारत की वैश्विक भूमिका को और मजबूत कर सकती है।








