युद्ध केवल स्वार्थ और वर्चस्व की लड़ाई, भारत ही दिखा सकता है शांति का रास्ता

Mohan Bhagwat

मुनादी लाइव : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को दुनिया में बढ़ते युद्ध और संघर्षों को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि आज दुनिया में जो टकराव, अशांति और युद्ध दिखाई दे रहे हैं, उनकी असली वजह स्वार्थ और वर्चस्व की होड़ है। जब तक लोग अपने हितों से ऊपर उठकर नहीं सोचेंगे, तब तक दुनिया में स्थायी शांति स्थापित करना मुश्किल रहेगा।

नागपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि केवल बाहरी समझौते, भाषण या समझाइश से शांति कायम नहीं होती। इसके लिए समाज के भीतर एकता, अनुशासन और धर्म के मूल्यों का होना जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्थायी शांति का रास्ता भीतर से शुरू होता है, और जब तक इंसान की सोच में स्वार्थ बना रहेगा, तब तक संघर्ष खत्म नहीं होंगे।

2000 साल के प्रयोग भी नहीं दे सके स्थायी समाधान
संघ प्रमुख ने कहा कि पिछले करीब दो हजार वर्षों में दुनिया ने संघर्षों को खत्म करने के लिए कई तरह के विचारों और व्यवस्थाओं को आजमाया, लेकिन उनमें से बहुत कम ही सफल हो पाए। उनके मुताबिक अब समय आ गया है कि मानवता ऐसे रास्तों को अपनाए, जो वास्तव में टिकाऊ शांति की ओर ले जाएं।

whatsapp channel

Jever News Paper

उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि केवल शक्ति संतुलन, समझौते या राजनीतिक समीकरण शांति की गारंटी नहीं दे सकते। जब तक समाज के भीतर मूल्यों, नैतिकता और संतुलित सोच का विकास नहीं होगा, तब तक युद्ध और टकराव बार-बार सामने आते रहेंगे।

the-habitat-ad

नागपुर में सभा को किया संबोधित
मोहन भागवत ने यह बातें विश्व हिंदू परिषद के दफ्तर की नींव रखने के बाद आयोजित सभा में कहीं। इस दौरान उन्होंने मौजूदा वैश्विक और सामाजिक हालात पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय एक अस्थिर दौर से गुजर रही है और चारों तरफ जो हालात बन रहे हैं, वे चिंताजनक हैं।

resizone elanza

उनके अनुसार, आज भी समाज में धार्मिक असहिष्णुता, जबरदस्ती धर्म परिवर्तन और ऊंच-नीच की मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यही वजह है कि समाज के भीतर तनाव और विभाजन की स्थिति बनी रहती है। उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए समाज को संगठित और जागरूक होना होगा।

Maa RamPyari Hospital

Telegram channel

भारत की भूमिका पर भी दिया जोर
अपने संबोधन में भागवत ने भारत की मूल सोच और वैश्विक भूमिका का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा हमेशा से मानवता, सद्भाव और सहअस्तित्व की रही है। भारत ने दुनिया को टकराव नहीं, बल्कि साथ मिलकर चलने का मार्ग दिखाया है।

उन्होंने यह संदेश भी दिया कि यदि दुनिया को वास्तविक शांति चाहिए, तो उसे केवल ताकत की राजनीति से आगे बढ़कर मानव मूल्यों और सामूहिक कल्याण की दिशा में सोचना होगा। समाज को एकजुट रखते हुए ही बढ़ते संघर्षों और अस्थिरता का सामना किया जा सकता है।

मोहन भागवत के इस बयान को मौजूदा वैश्विक तनाव, युद्ध और सामाजिक चुनौतियों के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके इस संबोधन में जहां एक ओर विश्व व्यवस्था पर चिंता दिखाई दी, वहीं दूसरी ओर समाज को मूल्यों और एकता के रास्ते पर चलने का संदेश भी दिया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *