मनरेगा में ₹39.39 लाख का डिजिटल फर्जीवाड़ा, कंप्यूटर ऑपरेटर पर FIR; BDO समेत अधिकारियों से केवल स्पष्टीकरण
गुमला के डुमरी प्रखंड में मनरेगा फंड की फर्जी निकासी, नौ लोगों के खाते में भेजी गई राशि; BDO और अन्य अधिकारी जांच के बाद छोड़े गए
गुमला : जिले के डुमरी प्रखंड में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) योजना के तहत बड़े पैमाने पर डिजिटल फर्जीवाड़ा सामने आया है। इस घोटाले में ₹39.39 लाख की फर्जी निकासी की पुष्टि हुई है। जांच में पाया गया कि तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) के डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल कर यह फर्जी निकासी की गई।
जिला प्रशासन ने अनियमितता की शिकायत के बाद जांच समिति का गठन किया। समिति की रिपोर्ट में साफ हुआ कि डिजिटल सिग्नेचर के आधार पर यह फर्जी भुगतान नौ अलग-अलग खातों में किया गया। इन खाताधारकों का डुमरी प्रखंड से कोई संबंध नहीं था, बल्कि वे पालकोट क्षेत्र के निवासी हैं।
कंप्यूटर ऑपरेटर राजू साहू दोषी ठहराया गया
जिला प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर मार्च 2025 में कुल 10 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। इनमें कंप्यूटर ऑपरेटर राजू साहू और नौ खाताधारक — अमित राम, सुमित नायक, भगवान नायक, बिरसमुनी देवी, दिलीप यादव, टुम्पा यादव, पंपा यादव, देवंती देवी और हीरा लाल यादव शामिल हैं। इन लोगों के खातों में फर्जी तरीके से राशि भेजी गई थी।
अधिकारियों से सिर्फ स्पष्टीकरण
जांच में यह भी सामने आया कि तत्कालीन BDO के डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल हुआ। इस पर जिला प्रशासन ने तत्कालीन अतिरिक्त प्रभार BDO प्रीति किसकू, एकता वर्मा, उमेश स्वांसी और प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी (BPO) संदीप उरांव से स्पष्टीकरण मांगा।
प्रीति किसकू ने स्वीकार किया कि काम के बोझ के कारण उन्होंने कार्यहित में अपना डिजिटल सिग्नेचर BPO/कंप्यूटर ऑपरेटर को दे दिया था। उन्होंने सरकार से खुद को मामले से मुक्त करने की अपील भी की। एकता वर्मा ने अपने बचाव में कहा कि भुगतान से पहले कर्मियों का विवरण BPO और DPC स्तर पर भरा और फ्रीज किया जाता है। उनका संदेह है कि कंप्यूटर ऑपरेटर राजू साहू ने जानबूझकर फर्जीवाड़ा किया।
उमेश स्वांसी और संदीप उरांव ने भी फर्जी निकासी में राजू साहू की संलिप्तता बताई। वहीं तारणी कुमार महतो ने दो बार रिमाइंडर भेजे जाने के बावजूद भी अपना स्पष्टीकरण नहीं दिया।
BDO और बड़े अधिकारी बचे
हालांकि, जिला प्रशासन ने इन सभी अधिकारियों को सिर्फ नोटिस देकर छोड़ दिया। इस मामले में फिलहाल केवल कंप्यूटर ऑपरेटर राजू साहू और नौ खाताधारकों के खिलाफ ही कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाई जा रही है। डिजिटल सिग्नेचर सौंपने वाले अधिकारियों पर अब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है।
बड़ा सवाल – जवाबदेही कौन लेगा?
मनरेगा जैसे गरीब और ग्रामीण रोजगार आधारित योजना में इस तरह का फर्जीवाड़ा गुमला जिले में पहली बार उजागर हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उच्च पदस्थ अधिकारी अपने डिजिटल सिग्नेचर अन्य कर्मचारियों को देते हैं तो यह सीधे-सीधे नियमों का उल्लंघन है। बावजूद इसके, प्रशासन ने इन पर कोई कड़ा कदम नहीं उठाया।
ग्रामीणों में भी इस फर्जीवाड़े को लेकर नाराजगी है। उनका कहना है कि गरीबों के हक के पैसे की लूट हुई है और दोषी अधिकारियों को सजा मिलनी चाहिए। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन आगे इस मामले में क्या कदम उठाता है।








