वीरेंद्र राम घोटाला: ईडी की चार्जशीट में खुला भ्रष्ट नेटवर्क — अफसर, ठेकेदार और हवाला चैनल सब जुड़े थे
ईडी की 110 पन्नों की रिपोर्ट में खुलासा, सरकारी विभागों में कमीशन राज की जड़ें और गहरी, 7 नाम आए जांच के घेरे में
ईडी की चार्जशीट में नए खुलासे
रांची: झारखंड के बहुचर्चित चीफ इंजीनियर वीरेंद्र राम घूसकांड में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 110 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट दायर की है। इसमें यह खुलासा हुआ है कि वीरेंद्र राम अकेले नहीं थे — बल्कि उनके इर्द-गिर्द अफसरों, ठेकेदारों और हवाला बिचौलियों का पूरा नेटवर्क सक्रिय था।
ईडी के मुताबिक, यह नेटवर्क “कमीशन के बदले टेंडर देने की प्रणाली” पर काम करता था, जहां ठेकेदारों से कमीशन लेकर उसे हवाला चैनलों के जरिये सफेद धन में बदला जाता था।
कैसे काम करता था टेंडर-घूस नेटवर्क
जांच में ईडी ने वीरेंद्र राम की “कमीशन व्यवस्था” का पूरा फ्लोचार्ट तैयार किया है —
| चरण | विवरण |
|---|---|
| 1. ठेकेदारों की पहचान | टेंडर प्रक्रिया से पहले ही पसंदीदा ठेकेदार तय किए जाते थे। |
| 2. टेंडर पास कराने की डील | प्रोजेक्ट वैल्यू का 2–3% कमीशन तय किया जाता था। |
| 3. नकद सौंपना | रकम वीरेंद्र राम के सरकारी आवास (जमशेदपुर/रांची) में दी जाती थी। |
| 4. हवाला के जरिये मनी लॉन्ड्रिंग | रकम को कोलकाता, दिल्ली और जमशेदपुर के हवाला एजेंटों से घुमाया जाता था। |
| 5. संपत्ति में निवेश | पैसे को फ्लैट, वाहनों और जमीन खरीद में लगाया जाता था। |
ईडी ने इस नेटवर्क को “Tender Commission Syndicate” नाम दिया है।
7 नाम जो ईडी की रडार पर हैं
ईडी की जांच में 7 लोगों के नाम सामने आए हैं, जिनकी भूमिका अलग-अलग स्तर पर रही:
- वीरेंद्र कुमार राम — तत्कालीन चीफ इंजीनियर, ग्रामीण विकास विभाग
- राजेश कुमार — ठेकेदार, दो कंपनियों का निदेशक
- परमानंद सिंह — राजेश के पार्टनर, बिल्डर फर्म से जुड़े
- एक जूनियर इंजीनियर (नाम गोपनीय) — फर्जी माप पुस्तिकाओं की एंट्री में भूमिका
- दो अकाउंटेंट — रकम के हस्तांतरण में शामिल
- एक हवाला एजेंट — कोलकाता स्थित, ईडी की रडार पर
चार्जशीट के अनुसार, इन सभी की भूमिका “एक सुनियोजित कमीशन चेन” का हिस्सा रही, जहां ठेकेदार से लेकर अधिकारी तक हर स्तर पर हिस्सेदारी तय थी।
हवाला रूट से सफेद हुआ काला धन
ईडी ने पाया कि वीरेंद्र राम और उनके सहयोगियों ने हवाला नेटवर्क के जरिए
भारी नकद रकम को वैध दिखाने के लिए कोलकाता और दिल्ली के फर्जी खातों में ट्रांसफर कराया। रकम वहां से “कंसल्टेंसी पेमेंट” और “सप्लायर बिल” के नाम पर बाहर निकाली गई।
एक ईडी अधिकारी के अनुसार —
“हवाला के जरिए भेजे गए लगभग 70 लाख रुपये को बाद में वीरेंद्र राम के परिवार के
बैंक खातों में निवेश या FD के रूप में पाया गया है।”
ठेकेदार राजेश कुमार बना सरकारी गवाह
ईडी की जांच में ठेकेदार राजेश कुमार अब सरकारी गवाह बन गया है। उसने स्वीकार किया है कि वीरेंद्र राम ने टेंडर पास कराने के लिए “कमीशन तय कर लेने की परंपरा” को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया की तरह इस्तेमाल किया।
राजेश कुमार ने बयान में कहा —
“2019 में मुझे 62 करोड़ रुपये का टेंडर मिला था।
इस टेंडर के बदले वीरेंद्र कुमार राम ने 1.88 करोड़ रुपये नकद मांगे थे।
भुगतान मैंने उनके सरकारी आवास पर किया था।”
मंहगी गाड़ियां और संपत्तियों का नेटवर्क
ईडी ने वीरेंद्र राम के खिलाफ 3.5 करोड़ रुपये से अधिक की अघोषित संपत्ति ट्रेस की है।
इनमें शामिल हैं —
- Toyota Fortuner और Innova गाड़ियां (राजेश कुमार की कंपनियों से खरीदी गईं)
- रांची और जमशेदपुर में दो फ्लैट, जिनकी कीमत 1.8 करोड़ रुपये
- दो प्लॉट और एक फॉर्म हाउस, जिसमें निवेश हवाला के जरिए हुआ
- कई बैंक खातों में FD और निवेश, परिवार के नाम से किए गए
ईडी के निशाने पर “Departmental Shielding” भीचार्जशीट में यह भी उल्लेख है कि वीरेंद्र राम के खिलाफ
2018 से ही शिकायतें आती रही थीं, लेकिन विभागीय स्तर पर उन्हें “राजनीतिक संरक्षण” मिला।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बयान में कहा —
“जांच शुरू होते ही फाइलें गायब कर दी जाती थीं,और आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट को दबा दिया गया था।”
ईडी अब उन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कर रही है जिन्होंने शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं की।
राज्य सरकार की मुश्किलें बढ़ीं
ईडी की इस चार्जशीट ने झारखंड सरकार की छवि पर भी सवाल उठाए हैं,
क्योंकि वीरेंद्र राम को जमानत के बाद दोबारा पदस्थापित किया गया था।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि प्रभावशाली नेटवर्क” की वजह से ही उन्हें दोबारा पद मिला।
विपक्ष ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है —
“सरकार ने जिन अफसरों पर घूस के आरोप हैं, उन्हें फिर से बहाल किया। यह साफ संकेत है कि भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया जा रहा है।”
ईडी अब राज्य सरकार से रिपोर्ट तलब करने की तैयारी में है।








