जनगणना 2027 में बड़ा बदलाव: लिव-इन रिलेशनशिप को मिलेगा शादीशुदा जैसा दर्जा
नई दिल्ली: भारत की आगामी जनगणना 2027 को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है, जो देश के सामाजिक ढांचे और पारंपरिक मान्यताओं पर गहरा असर डाल सकता है। सरकार द्वारा जारी सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल के FAQ के अनुसार, अब लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल्स को भी जनगणना में शादीशुदा के रूप में दर्ज किया जाएगा — बशर्ते वे खुद को “स्टेबल रिलेशनशिप” में मानते हों।
यह निर्णय पूरी तरह से संबंधित कपल के स्वयं के बयान (self-declaration) पर आधारित होगा, जिससे यह साफ होता है कि सरकार अब पारंपरिक विवाह के अलावा अन्य सामाजिक व्यवस्थाओं को भी डेटा संग्रह में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
क्या है नया प्रावधान?
जनगणना 2027 के तहत शुरू किए गए डिजिटल सेल्फ-एन्यूमरेशन सिस्टम में नागरिकों को खुद अपनी जानकारी दर्ज करने का विकल्प दिया जाएगा। इसी पोर्टल के FAQ सेक्शन में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई पुरुष और महिला बिना शादी के एक ही घर में लंबे समय से साथ रह रहे हैं और खुद को एक स्थायी (stable) संबंध में मानते हैं, तो उन्हें “married” श्रेणी में गिना जाएगा। इसका मतलब यह हुआ कि अब केवल कानूनी विवाह ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से स्थापित सहजीवन (live-in relationship) भी सरकारी डेटा में वैवाहिक स्थिति के रूप में दर्ज होगा।
सामाजिक बदलाव की ओर संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत में तेजी से बदलते सामाजिक ढांचे का संकेत है। महानगरों और शहरी क्षेत्रों में लिव-इन रिलेशनशिप का चलन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है, लेकिन इसे अब तक आधिकारिक आंकड़ों में स्पष्ट रूप से जगह नहीं मिलती थी। जनगणना में इस तरह के संबंधों को शामिल करना यह दर्शाता है कि सरकार अब समाज के बदलते स्वरूप को स्वीकार करते हुए डेटा संग्रह को अधिक यथार्थवादी बनाने की कोशिश कर रही है।
डेटा कलेक्शन पर क्या होगा असर?
इस फैसले से जनगणना के आंकड़े अधिक व्यापक और वास्तविक हो सकते हैं। अब तक कई लोग अपनी वास्तविक रिलेशनशिप स्टेटस को छुपाते थे या “अनमैरीड” कैटेगरी में आते थे, जिससे डेटा में अंतर रह जाता था।
अब “self-declaration” के आधार पर जानकारी दर्ज होने से:
- वास्तविक सामाजिक संरचना सामने आएगी
- परिवार की परिभाषा अधिक व्यापक होगी
- नीति निर्माण में मदद मिलेगी
क्या है कानूनी स्थिति?
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर न्यायपालिका पहले ही कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से साथ रहते हैं, तो यह अवैध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता दे चुका है, खासकर महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा के संदर्भ में। हालांकि, जनगणना में इसे “शादीशुदा” के रूप में दर्ज करना एक प्रशासनिक और सांख्यिकीय निर्णय है, न कि कानूनी विवाह का दर्जा देना। संभावित विवाद और बहस
इस फैसले को लेकर समाज में बहस भी तेज हो सकती है। एक ओर जहां इसे आधुनिक सोच और वास्तविकता को स्वीकार करने वाला कदम माना जा रहा है, वहीं कुछ वर्ग इसे पारंपरिक विवाह संस्था के खिलाफ भी देख सकते हैं। ग्रामीण और पारंपरिक समाज में इस बदलाव को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।
विशेषज्ञों की राय
सामाजिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम डेटा कलेक्शन को अधिक सटीक बनाने के लिए जरूरी था। उनका मानना है कि यदि सरकार को सही नीतियां बनानी हैं, तो उसे समाज के हर वर्ग और हर प्रकार के संबंधों को समझना होगा। जनगणना 2027 में लिव-इन रिलेशनशिप को शादीशुदा के रूप में दर्ज करने का फैसला भारत में बदलते सामाजिक ढांचे का एक बड़ा संकेत है। यह न केवल डेटा संग्रह की प्रक्रिया को अधिक यथार्थवादी बनाएगा, बल्कि नीति निर्माण में भी अहम भूमिका निभाएगा।
हालांकि, इस फैसले के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर आने वाले समय में व्यापक चर्चा होना तय है।








