क्या Signal, Telegram और Rocket.Chat जैसे ऐप्स से चल रहा आतंकी नेटवर्क? समझिए पूरा डिजिटल तंत्र

Rocket Chat

मुनादी लाइव : भारत में हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से हुई गिरफ्तारियों के बाद सुरक्षा एजेंसियों की जांच में यह आशंका सामने आई है कि कुछ कट्टरपंथी और आतंकी संगठन डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए अपने नेटवर्क को संचालित कर रहे हैं। जांच में यह संकेत मिले हैं कि ये लोग सुरक्षित मैसेजिंग प्लेटफॉर्म जैसे Signal, Telegram और Rocket.Chat का उपयोग आपसी संपर्क और गतिविधियों के समन्वय के लिए कर रहे थे।

पुलिस ने इस मामले में छह लोगों को Unlawful Activities (Prevention) Act यानी यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया है। इसके बाद देश में साइबर आतंकवाद को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

एन्क्रिप्टेड ऐप्स क्यों चुनते हैं आतंकी संगठन
आतंकी संगठनों द्वारा इन ऐप्स को चुनने की सबसे बड़ी वजह एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन है। एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन का मतलब है कि संदेश केवल भेजने वाले और प्राप्त करने वाले व्यक्ति ही पढ़ सकते हैं। बीच में कोई तीसरा व्यक्ति या सर्वर भी संदेश की सामग्री नहीं देख सकता। इसी कारण सुरक्षा एजेंसियों के लिए इन प्लेटफॉर्म पर होने वाली बातचीत को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।

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कुछ ऐप्स में तो सेल्फ-डिस्ट्रक्टिंग मैसेज, सीक्रेट चैट, और अनाम अकाउंट जैसी सुविधाएं भी होती हैं, जो निगरानी को और कठिन बना देती हैं।

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Signal, Telegram और Rocket.Chat में क्या खास
इन ऐप्स की तकनीकी संरचना ही इन्हें सुरक्षित बनाती है। Signal को दुनिया के सबसे सुरक्षित मैसेजिंग प्लेटफॉर्म में से एक माना जाता है। इसमें मजबूत एन्क्रिप्शन तकनीक का उपयोग किया जाता है और कई बार उपयोगकर्ता की पहचान भी सीमित जानकारी के साथ बनाई जा सकती है।

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Telegram में बड़े-बड़े ग्रुप और चैनल बनाने की सुविधा होती है। कई बार कट्टरपंथी संगठन इन चैनलों का उपयोग प्रचार, भर्ती और संदेश प्रसार के लिए करते हैं।

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Rocket.Chat एक ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म है, जिसे कोई भी संस्था अपने निजी सर्वर पर चला सकती है। इस कारण यदि कोई समूह इसे अपने नियंत्रण में संचालित करे तो बाहरी निगरानी लगभग असंभव हो जाती है।

आतंकी नेटवर्क कैसे करता है इनका इस्तेमाल
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इन प्लेटफॉर्म का उपयोग कई चरणों में किया जाता है। सबसे पहले खुले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर संभावित समर्थकों या नए सदस्यों की पहचान की जाती है। इसके बाद उन्हें धीरे-धीरे अधिक सुरक्षित प्लेटफॉर्म जैसे Signal या Telegram के सीक्रेट ग्रुप में शामिल किया जाता है।

इन निजी समूहों में विचारधारा का प्रचार, संपर्क बनाए रखना और गतिविधियों की योजना तैयार करना आसान हो जाता है। कुछ मामलों में इन ऐप्स के जरिए धन जुटाने, सामग्री साझा करने और निर्देश भेजने जैसी गतिविधियां भी की जाती हैं।

गाजियाबाद गिरफ्तारी के बाद जांच तेज
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में पुलिस की कार्रवाई के बाद यह मामला चर्चा में आया। जांच एजेंसियों ने पाया कि संदिग्ध लोग आपस में संपर्क के लिए सुरक्षित मैसेजिंग ऐप्स का उपयोग कर रहे थे।

पुलिस ने छह लोगों को गिरफ्तार किया है और उनके डिजिटल उपकरणों की जांच की जा रही है। एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या यह नेटवर्क किसी बड़े आतंकी संगठन से जुड़ा हुआ था या स्थानीय स्तर पर संचालित हो रहा था।

सरकार और एजेंसियों की चुनौती
डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। एक तरफ यह तकनीक नागरिकों की निजता और सुरक्षित संचार के लिए जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ इसका दुरुपयोग अपराध और आतंकवाद के लिए भी किया जा सकता है। इसी कारण कई देशों में एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म की निगरानी और साइबर सुरक्षा कानूनों को लेकर बहस चल रही है।

भारत में भी साइबर सुरक्षा एजेंसियां इन प्लेटफॉर्म के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए नई तकनीकों और जांच तंत्र को मजबूत करने पर काम कर रही हैं।

साइबर आतंकवाद से निपटने की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए केवल तकनीकी निगरानी ही नहीं बल्कि खुफिया जानकारी, साइबर विश्लेषण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी है। डिजिटल दुनिया में सक्रिय आतंकी नेटवर्क कई देशों में फैले होते हैं, इसलिए इनके खिलाफ कार्रवाई के लिए वैश्विक स्तर पर समन्वय आवश्यक माना जाता है।

Signal, Telegram और Rocket.Chat जैसे प्लेटफॉर्म मूल रूप से सुरक्षित संचार के लिए बनाए गए हैं, लेकिन यदि इनका दुरुपयोग किया जाए तो यह सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। गाजियाबाद में हुई हालिया गिरफ्तारी ने यह संकेत दिया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए संचालित नेटवर्क को लेकर सतर्क रहने की आवश्यकता है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में साइबर आतंकवाद और डिजिटल नेटवर्क की निगरानी राष्ट्रीय सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जाएगी।

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