मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही क्यों? तिथि का भ्रम खत्म, जानिए पूरा कारण

Makar Sankranti 2026

उदयातिथि और एकादशी के कारण 14 नहीं, 15 जनवरी को मनाया जाएगा दही-चूड़ा और खिचड़ी का पर्व

Ranchi : मकर संक्रांति के पर्व को लेकर इस वर्ष बनी तिथियों की उलझन अब पूरी तरह समाप्त हो गई है। ज्योतिषीय गणना और उदयातिथि के सिद्धांत के आधार पर विद्वान पंडितों ने स्पष्ट कर दिया है कि मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी, न कि 14 जनवरी को।

दरअसल, सूर्य देव का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी की रात 9 बजकर 19 मिनट पर हो रहा है। रात के समय स्नान, दान और पुण्यकर्म का विधान नहीं होने के कारण उदयातिथि के अनुसार 15 जनवरी को ही पुण्यकाल प्राप्त होगा। इसी वजह से खिचड़ी, दही-चूड़ा और तिल दान का पर्व अगले दिन मनाना शास्त्रसम्मत माना गया है।

एकादशी भी बनी कारण
14 जनवरी को षष्टतिला एकादशी पड़ रही है, जिसमें चावल और तिल का सेवन वर्जित होता है। ऐसे में एकादशी व्रत के समापन के बाद 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाना ही धार्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ माना गया है।

उत्तरायण की शुरुआत, खरमास का समापन
मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव उत्तरायण होते हैं, जिसे देवताओं के दिन की शुरुआत माना जाता है। इसी दिन के साथ खरमास समाप्त हो जाएगा और विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों पर लगी रोक भी हट जाएगी।

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दान-पुण्य का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन तिल, गुड़, अनाज और गर्म कपड़ों का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

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कोडरमा के बाजारों में रौनक
झुमरीतिलैया समेत पूरे कोडरमा जिले में तिलकुट, दही और चूड़ा की मांग तेजी से बढ़ गई है। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा सामूहिक दही-चूड़ा भोज और जरूरतमंदों को कंबल वितरण की तैयारियां जोरों पर हैं। चंचलानी धाम और तिलैया डैम जैसे पिकनिक स्थलों पर भी भारी भीड़ की संभावना जताई जा रही है।

पौराणिक और वैज्ञानिक महत्व
माना जाता है कि इसी दिन भीष्म पितामह ने उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा कर देह त्याग किया था। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से तिल और गुड़ का सेवन शरीर को ऊर्जा देता है और सर्दी से बचाव करता है।

एक पर्व, अनेक नाम
झारखंड-बिहार में खिचड़ी या दही-चूड़ा, बंगाल में पौष संक्रांति, गुजरात में उत्तरायण, पंजाब में लोहड़ी और दक्षिण भारत में पोंगल—मकर संक्रांति भारत की सांस्कृतिक विविधता का जीवंत उदाहरण है।

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