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8 महीने तक लापता रही पुष्पा, अब जंगल से मिला कंकाल: हाईकोर्ट की फटकार के बाद खुली बोकारो पुलिस की पोल

Bokaro Murder Case

अगर कोर्ट न होता तो क्या मिलता न्याय?

8 महीने बाद कंकाल बना सच, बोकारो पुलिस पर गंभीर सवाल

रिपोर्ट: नीरज सिंह/ कुमार अमित
बोकारो/झारखंड : यह सिर्फ एक हत्या नहीं है… यह सिस्टम की संवेदनहीनता, पुलिस की लापरवाही और एक मां की टूटती उम्मीदों की कहानी है।

बोकारो के पिंडराजोरा थाना क्षेत्र से 8 महीने पहले गायब हुई 18 वर्षीय पुष्पा कुमारी का आखिरकार सच सामने आ गया, लेकिन जब तक सच्चाई सामने आई, तब तक बेटी का शरीर नहीं, बल्कि उसका नर कंकाल जंगल में सड़ चुका था। और सबसे बड़ा सवाल खड़ा खड़ा हो गया – अगर इस मामले में हाईकोर्ट दखल नहीं देता, तो क्या यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाता?

8 महीने तक “गुमशुदगी”, अब निकली हत्या
21 जुलाई 2025… एक तारीख, जो एक परिवार की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल गई। खूंटाडीह गांव की रहने वाली पुष्पा कुमारी अचानक गायब हो गई। परिवार ने तुरंत पुलिस को बताया…मां ने बार-बार कहा — दिनेश महतो ही आरोपी है। लेकिन पुलिस ने क्या किया? सिर्फ औपचारिकता, सिर्फ कागजी कार्रवाई और महीनों तक “जांच जारी है” का रटा-रटाया जवाब.

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मां चीखती रही, सिस्टम सोता रहा
पुष्पा की मां रेखा देवी लगातार अधिकारियों के चक्कर काटती रहीं। हर दरवाजा खटखटाया…हर जगह गुहार लगाई…लेकिन उनकी आवाज कहीं नहीं सुनी गई। क्या एक गरीब मां की आवाज इतनी कमजोर होती है कि उसे सुनने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़े?

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हाईकोर्ट की फटकार के बाद टूटी पुलिस की नींद
जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तब जाकर सिस्टम हिला। कोर्ट ने सख्ती दिखाई और बोकारो एसपी हरविंदर सिंह को सशरीर हाजिर होना पड़ा, झारखंड के डीजीपी को जवाब देना पड़ा और तब जाकर पुलिस हरकत में आई। यानी सवाल साफ है —क्या बिना कोर्ट के दबाव के पुलिस काम ही नहीं करती?

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आरोपी ने कबूला सच — “उसी दिन मार दिया था”
पुलिस ने आरोपी दिनेश महतो को हिरासत में लिया। कुछ ही देर की पूछताछ में वह टूट गया…और जो उसने बताया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था — उसने पुलिस को बताया कि 21 जुलाई को ही उसने चाकू से हत्या कर दी थी और शव को जंगल में ले जाकर छुपा दिया था , यानि जिस दिन बेटी गायब हुई…उसी दिन उसकी जिंदगी खत्म कर दी गई थी।

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जंगल में मिला कंकाल — इंसाफ का सबसे दर्दनाक सच
आरोपी की निशानदेही पर पुलिस मधुडीह जंगल पहुंची। वहां जो मिला, वह किसी भी इंसान को अंदर तक हिला देने वाला था — मिट्टी के नीचे दबा हुआ नर कंकाल, बिखरे हुए अवशेष और एक पूरी जिंदगी की कहानी, जो खत्म हो चुकी थी.

“पहले क्यों नहीं पकड़ा गया आरोपी?” — सबसे बड़ा सवाल
जनता बोकारो पुलिस से बड़ा और सीधा सवाल पूछ रही है कि जब परिवार शुरू से आरोपी का नाम बता रहा था… तो पुलिस ने उसे पहले क्यों नहीं पकड़ा? आरोपी 8 महीने तक आरोपी खुला घूमता रहा…और पुलिस सिर्फ फाइलें पलटती रही. अगर समय पर कार्रवाई होती तो कम से कम पुष्पा के परिवार को न्याय इतना देर से नहीं मिलता?

पुलिस पर कार्रवाई, लेकिन क्या यह काफी है?
मामले में लापरवाह थाना प्रभारी और मुंशी को लाइन हाजिर कर दिया गया। लेकिन सवाल यह है की क्या इतनी बड़ी लापरवाही की सजा सिर्फ “लाइन हाजिर” है? जब एक बेटी की जिंदगी चली गई और आरोपी खुलेआम घूमते रहा और पुष्पा के परिवार वाले दर दर की ठोकरे खाते रहे तो जिम्मेदारी किसकी बनती है ?

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CID की एंट्री — अब क्यों?
अब जब मामला खुल चुका है, CID के डीआईजी मौके पर पहुंच रहे हैं , लेकिन सवाल वही है , क्या यह जांच पहले नहीं हो सकती थी?

सिस्टम पर बड़ा सवाल
यह मामला सिर्फ एक अपराध का नहीं है, यह सिस्टम की असफलता का आईना है। जहाँ गरीबो की शिकायत की अनदेखी की जाती है और हाईकोर्ट के दबाव बाद तुरंत कार्रवाई

क्या यही व्यवस्था है?
एक मां की जीत या हार? रेखा देवी ने हार नहीं मानी…उन्होंने आखिर तक लड़ाई लड़ी…हाईकोर्ट तक गईं…उन्हें सच मिला…लेकिन बेटी नहीं मिली। क्या इसे न्याय कहेंगे? या यह सिर्फ एक अधूरा इंसाफ है?

बोकारो का यह मामला झकझोर देता है…यह बताता है कि सिस्टम तब तक नहीं जागता, जब तक उसे जगाया न जाए, गरीब की आवाज अक्सर दब जाती है और न्याय… अक्सर देर से आता है. अब सबसे बड़ा सवाल — क्या इस मामले से कोई सीख ली जाएगी? या फिर अगली पुष्पा के साथ भी यही होगा?

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