सिलेबस बदलाव का असर: झारखंड में पुरानी किताबों का बाजार ठप, अभिभावकों पर बढ़ा खर्च
झारखंड में हर साल नई किताबें खरीदने की मजबूरी, बढ़ता जा रहा खर्च
झारखंड: राज्यभर में स्कूलों के सिलेबस में लगातार हो रहे बदलाव का असर अब साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। जहां एक ओर शिक्षा प्रणाली को अपडेट करने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसका सीधा असर अभिभावकों की जेब और पुराने किताबों के कारोबार पर पड़ रहा है। झारखंड के कई शहरों और कस्बों में पुराने किताबों का बाजार धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, जबकि अभिभावकों को हर साल नई किताबें खरीदने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है।
पुरानी किताबों का कारोबार संकट में
राज्यभर के किताब विक्रेताओं का कहना है कि पहले एक ही सिलेबस कई वर्षों तक चलता था, जिससे पुरानी किताबों की खरीद-बिक्री का एक बड़ा बाजार तैयार हो गया था। बड़े बच्चों की किताबें छोटे बच्चे इस्तेमाल कर लेते थे, जिससे अभिभावकों का खर्च भी कम होता था और दुकानदारों का कारोबार भी चलता रहता था। लेकिन अब हर साल सिलेबस बदलने के कारण पुरानी किताबें बेकार हो रही हैं और दुकानदारों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
अभिभावकों पर बढ़ता आर्थिक दबाव
अभिभावकों का कहना है कि अब स्कूलों की ओर से हर साल पूरी किताबों का सेट खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। पहले जहां पुरानी किताबों से काम चल जाता था, अब हर सत्र में नई किताबें खरीदनी पड़ती हैं। इसके अलावा बाजार में एक-दो किताबें अलग से मिलना भी मुश्किल हो गया है, जिससे पूरा सेट लेना ही एकमात्र विकल्प बचता है।
पूरा सेट खरीदने की अनिवार्यता
अभिभावकों के अनुसार, स्कूलों द्वारा पूरे सेट की अनिवार्यता ने खर्च को कई गुना बढ़ा दिया है। एक बच्चे की किताबों पर 8 से 10 हजार रुपये तक खर्च करना पड़ रहा है, जो मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
“स्कूल और पब्लिशर्स का गठजोड़” का आरोप
अभिभावक संगठनों का आरोप है कि निजी स्कूलों और पब्लिशर्स के बीच गठजोड़ के कारण यह स्थिति पैदा हो रही है। उनका कहना है कि जहां NCERT की किताबों का पूरा सेट अपेक्षाकृत सस्ता होता है, वहीं निजी स्कूलों द्वारा निर्धारित किताबों की कीमत कई गुना ज्यादा होती है। इससे अभिभावकों को मजबूरी में महंगी किताबें खरीदनी पड़ती हैं।
सिलेबस बदलाव पर उठते सवाल
लगातार हो रहे सिलेबस बदलाव को लेकर अब विशेषज्ञ और अभिभावक दोनों सवाल उठा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा में सुधार जरूरी है, लेकिन बार-बार बदलाव से छात्रों और अभिभावकों दोनों पर दबाव बढ़ता है। संतुलित और दीर्घकालिक सिलेबस नीति की जरूरत महसूस की जा रही है।
स्कूलों की भूमिका पर बहस
इस मुद्दे ने स्कूलों की भूमिका पर भी बहस छेड़ दी है। अभिभावकों का कहना है कि स्कूलों को चाहिए कि वे केवल आवश्यक बदलाव करें और किताबों के चयन में पारदर्शिता बनाए रखें, ताकि अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचा जा सके। झारखंड में सिलेबस बदलाव का असर अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक और सामाजिक मुद्दा बन गया है।
पुरानी किताबों का बाजार खत्म हो रहा है और अभिभावकों पर खर्च का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार, शिक्षा विभाग और स्कूल प्रबंधन मिलकर ऐसी नीति बनाए, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहे और अभिभावकों को राहत भी मिल सके।







