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इस्लामाबाद में US-ईरान शांति वार्ता नाकाम, पाकिस्तान ने किया हाई लेवल सिक्योरिटी अलर्ट

US Iran talks Islamabad

ईरानी नेताओं की सुरक्षा के लिए मिसाइल सिस्टम, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम रहे सक्रिय

मुनादी लाइव : इस्लामाबाद में आयोजित अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता आखिरकार बेनतीजा खत्म हो गई। करीब 21 घंटे तक चली इस बातचीत से किसी ठोस समाधान की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन अंततः दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी। इस वार्ता के विफल होने के साथ ही एक बार फिर मध्य पूर्व क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका गहरा गई है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान द्वारा किए गए कड़े सुरक्षा इंतजामों की हो रही है।

पाकिस्तान ने क्यों बढ़ाई सुरक्षा?
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान इस वार्ता को लेकर बेहद सतर्क था। खासकर ईरानी प्रतिनिधिमंडल और उच्च-स्तरीय नेताओं की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहता था। इसकी एक बड़ी वजह इज़राइल द्वारा पहले तेहरान में किए गए हाई-प्रोफाइल हमले हैं, जिनमें कई अहम व्यक्तियों को निशाना बनाया गया था। इन्हीं घटनाओं को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान ने इस बार सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए। पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र ने यह सुनिश्चित किया कि वार्ता के दौरान ईरानी नेताओं को किसी भी तरह का खतरा न हो।

ईरानी विमानों की एंट्री से पहले हाई अलर्ट
पाकिस्तान वायु सेना और सुरक्षा एजेंसियों के शीर्ष सूत्रों के अनुसार, 10 अप्रैल की देर रात जब ईरान के विशेष विमान IRAN04 और IRAN05 इस्लामाबाद पहुंचने वाले थे, उससे पहले ही पाकिस्तान ने अपने दक्षिण-पश्चिमी हवाई क्षेत्र में हाई अलर्ट घोषित कर दिया था। अरब सागर के ऊपर एक बहु-स्तरीय हवाई सुरक्षा कवच तैयार किया गया, जिसमें आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तकनीकों का इस्तेमाल किया गया।

कैसे काम कर रहा था सुरक्षा तंत्र?
सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान ने इस दौरान सभी एयर सर्विलांस रडार को सक्रिय कर दिया, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सपोर्ट सिस्टम ऑन कर दिए और एयर डिफेंस और मिसाइल सिस्टम को हाई अलर्ट पर रखा साथ ही संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए विशेष निगरानी तंत्र तैनात किया । इन सभी उपायों का मकसद था कि ईरानी विमानों और नेताओं को किसी भी संभावित हवाई खतरे से सुरक्षित रखा जा सके।

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वार्ता क्यों हुई फेल?
हालांकि सुरक्षा के इतने कड़े इंतजामों के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद बने रहे। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त नियंत्रण स्वीकार करे और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करे, जबकि ईरान अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अधिकारों पर समझौता करने को तैयार नहीं है।

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वैश्विक असर की आशंका
इस वार्ता के असफल होने के बाद अब वैश्विक स्तर पर इसके असर की चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों, एलपीजी सप्लाई और शेयर बाजार पर पड़ सकता है। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, वहां किसी भी तरह का तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

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पाकिस्तान की भूमिका पर चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी अहम रही। एक ओर उसने दोनों देशों के बीच वार्ता के लिए मंच उपलब्ध कराया, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर यह दिखाया कि वह इस मामले को लेकर कितना गंभीर है। हालांकि, वार्ता के असफल होने के बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।

आगे क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का कोई नया दौर शुरू होगा या क्षेत्र में तनाव और बढ़ेगा। आने वाले दिनों में इस पूरे घटनाक्रम के और भी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल, इस्लामाबाद में हुई यह असफल वार्ता और पाकिस्तान की हाई-टेक सुरक्षा व्यवस्था वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है।

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