महिला आरक्षण बिल पर झटका, 2/3 बहुमत भी नहीं जुटा पाई सरकार
लोकसभा में 298 वोट पक्ष में, 230 विपक्ष में; विशेष सत्र में गरमाई सियासत
मुनादी लाइव : लोकसभा के विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक को लेकर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। सरकार इस महत्वपूर्ण बिल को पास कराने में दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सकी। मतदान के दौरान 298 सांसदों ने बिल के पक्ष में वोट दिया, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया। हालांकि, सरकार को साधारण बहुमत जरूर मिला, लेकिन संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण यह बिल फिलहाल अधर में लटक गया है।
क्या है महिला आरक्षण बिल?
महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है। लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि राजनीति में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले। सरकार इस बिल को ऐतिहासिक कदम बताते हुए इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही थी, लेकिन संसद में अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया।
आंकड़ों में समझें स्थिति
लोकसभा में इस बिल पर मतदान के दौरान कुल 528 सांसदों ने हिस्सा लिया।
- पक्ष में वोट: 298
- विपक्ष में वोट: 230
संवैधानिक संशोधन के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है, जो इस बार सरकार जुटाने में विफल रही।
पक्ष-विपक्ष में तीखी बहस
विशेष सत्र के पहले दिन से ही इस बिल को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। सरकार ने इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताते हुए कहा कि इससे लोकतंत्र और मजबूत होगा। वहीं विपक्ष ने इस बिल पर कई सवाल उठाए। विपक्षी दलों का कहना था कि इसमें ओबीसी और अन्य पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान नहीं है। साथ ही कुछ दलों ने परिसीमन और जनगणना से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल खड़े किए।
विशेष सत्र में बढ़ी राजनीतिक हलचल
18 अप्रैल तक चलने वाले इस विशेष सत्र में महिला आरक्षण समेत कई अहम विधेयकों पर चर्चा हो रही है। पहले दिन जहां बिल पेश किया गया, वहीं दूसरे दिन इस पर लंबी बहस और फिर मतदान हुआ। संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।
राज्यसभा में अलग घटनाक्रम
इस बीच राज्यसभा में एक अहम घटनाक्रम देखने को मिला, जहां हरिवंश नारायण सिंह को निर्विरोध उपसभापति चुना गया। नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि उनका अनुभव सदन के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
सरकार के सामने चुनौती
महिला आरक्षण बिल पर दो-तिहाई बहुमत न जुटा पाना सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। अब सरकार के सामने विपक्ष के साथ सहमति बनाकर इस बिल को दोबारा पेश करने की चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े और संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति के बिना आगे बढ़ना मुश्किल होगा।
आगे की रणनीति पर नजर
अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार इस बिल को लेकर आगे क्या रणनीति अपनाती है। क्या सरकार विपक्ष के साथ बातचीत कर सहमति बनाएगी या फिर इसमें संशोधन कर इसे दोबारा लाने की कोशिश करेगी—यह आने वाले समय में साफ होगा।
महिला आरक्षण विधेयक पर दो-तिहाई बहुमत हासिल न कर पाना यह दिखाता है कि भारतीय राजनीति में बड़े फैसलों के लिए व्यापक सहमति जरूरी है। यह मुद्दा सिर्फ एक विधेयक तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह बिल भविष्य में फिर से संसद में आता है और क्या इस बार इसे सभी दलों का समर्थन मिल पाता है।








