रिनपास में विवाद गहराया: प्रभारी निदेशक से स्वास्थ्य विभाग ने मांगा स्पष्टीकरण

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शिकायतों की जांच पर उठे सवाल

संस्थान पर उठते सवाल, 18 साल से स्थायी निदेशक नहीं

रांची/कांके: राजधानी रांची स्थित रिनपास (RINPAS) एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। संस्थान में पिछले करीब 18 वर्षों से स्थायी निदेशक की नियुक्ति नहीं होने के कारण प्रशासनिक व्यवस्था पहले से ही सवालों के घेरे में थी, लेकिन अब प्रभारी निदेशक को लेकर उठे नए आरोपों ने मामले को और गंभीर बना दिया है।

स्वास्थ्य विभाग ने मांगा स्पष्टीकरण
मिली जानकारी के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग झारखंड ने संस्थान के प्रभारी निदेशक डॉ जयति शिमलई से स्पष्टीकरण मांगा है। यह पत्र विभाग के अवर सचिव धिरंजन प्रसाद शर्मा द्वारा भेजा गया है, जिसमें 15 दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया है। बताया जा रहा है कि विभाग को प्रभारी निदेशक के खिलाफ लगातार शिकायतें मिल रही थीं, जिसके बाद यह कदम उठाया गया।

शिकायतकर्ताओं ने लगाए गंभीर आरोप
इस मामले में शिकायतकर्ता उत्तम कुमार, सूरज प्रकाश गुप्ता और सोनू मुंडा ने स्वास्थ्य विभाग को लिखित शिकायत देकर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत में यह भी आशंका जताई गई है कि प्रभारी निदेशक अपने पद का उपयोग कर चल रहे न्यायिक मामलों को प्रभावित कर सकते हैं। शिकायतकर्ताओं ने तत्काल प्रभाव से उन्हें पद से हटाने की मांग भी की है।

ACB कोर्ट का भी हस्तक्षेप
मामले को और गंभीर बनाते हुए ACB Court ने पहले ही इस प्रकरण में अभियोजन स्वीकृति की मांग स्वास्थ्य विभाग से की है। हालांकि, अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

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खरीद, टेंडर और आउटसोर्सिंग में गड़बड़ी के आरोप
शिकायत में रिनपास में लंबे समय से चल रही वित्तीय अनियमितताओं का भी जिक्र किया गया है। बताया गया है कि जेम (GeM) पोर्टल से खरीद, टेंडर प्रक्रिया और आउटसोर्सिंग सेवाओं के भुगतान में बड़े स्तर पर गड़बड़ी की आशंका है। यह भी आरोप है कि विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से कार्यरत कर्मियों के वेतन, पीएफ और बोनस में अनियमितता की गई है।

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एजेंसियों पर भी उठे सवाल
समानता सिक्योरिटी सर्विस और अन्य एजेंसियों को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कुछ एजेंसियों ने न्यूनतम मजदूरी, ईपीएफ और बोनस का पूरा भुगतान नहीं किया, जबकि संस्थान स्तर पर इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
यह स्थिति न केवल कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि संस्थान की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करती है।

बार-बार शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी गंभीर शिकायतों के बावजूद अब तक किसी व्यापक जांच की शुरुआत क्यों नहीं की गई। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने कई बार लिखित रूप से विभाग को जानकारी दी, लेकिन मामले को लगातार नजरअंदाज किया गया।

मंत्री और विभाग की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले ने स्वास्थ्य विभाग और संबंधित मंत्री की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जब कोर्ट तक मामला पहुंच चुका है और विभाग को शिकायतें मिल रही हैं, तब भी कार्रवाई में देरी पारदर्शिता और सुशासन पर सवाल खड़े करती है।

रिनपास विवाद अब केवल एक प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी संस्थानों की जवाबदेही और पारदर्शिता का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है या नहीं।

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